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लॉकडाउन के बाद मुमकिन है कोरोना का विस्फोट, नोबेल विजेता ने दिए बचाए के तरीके

लॉकडाउन के कारण अगर कोरोना वायरस का संक्रमण कम हो जाता है तो भी ये रुकेगा नहीं. जिस तरह से मुख्यतः उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग हजारों की संख्या में सड़क के रास्ते घर लौट रहे हैं, उससे ये डर बढ़ता है.

Abhishek Raghuvanshi29 मार्च 2020 · 1 मिनट पढ़ें
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लॉकडाउन के कारण अगर कोरोना वायरस का संक्रमण कम हो जाता है तो भी ये रुकेगा नहीं. जिस तरह से मुख्यतः उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग हजारों की संख्या में सड़क के रास्ते घर लौट रहे हैं, उससे ये डर बढ़ता है. हमें इसे संभालने के लिए तैयार रहना होगा. अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी (Abhijit Banerjee) और एस्तर डफलो (Esther Duflo) 21 दिनों के बाद क्या हो सकता है, और उसे कैसे ठीक किया जा सकता है, इसपर सुझाव देते हैं.

क्या आने वाले है और आने वाले महीनों में क्या करना चाहिए- इसे लागू करने में जो फासला होगा, उसके कई सारे दुष्परिणाम हो सकते हैं. मिसाल के तौर पर-

फिलहाल हम महामारी की रफ्तार कम करने की कोशिश कर रहे हैं. इसे विज्ञान की भाषा में flattening the curve कहते हैं. यानी हम बीमारी को रोक नहीं सकेंगे लेकिन उसकी गति को कम कर सकेंगे. लॉकडाउन इसी दिशा में एक कोशिश है. भले ही इसके बाद बीमारी फैलने की गति कम हो, लेकिन वो खत्म नहीं हो सकेगी. इसकी वजह हैं वे लोग जो यहां से वहां लौट रहे हैं. चूंकि बीमारी दो हफ्ते तक निष्क्रिय रहती हैं, इस वजह से कॉस्टैक्ट ट्रेसिंग से बहुत से लोग बच जाएंगे. जैसे बस में आसपास बैठ सफर करते लोगों में से अगर एक मरीज निकला तो उसकी बगल वाली सीट के शख्स को ट्रैक करना मुश्किल होगा. ये लोग अदृश्य एजेंट की तरह काम करेंगे और बीमारी फैलती रहेगी.

कई ऐसी जगहें हैं जहां बीमारी फैलने को रोकना काफी मुश्किल है अगर किसी को बीमारी हो जाए. जैसे कि शहरों के स्लम इलाकों में सोशल डिस्टेंसिंग या लॉकडाउन का पालन कठिन है जिसकी वजह से बीमारी फैल सकती है.लोगों में बीमारी फैलने से बहुत पहले ही लॉकडाउन हो गया. यानी किसी में भी इसके लिए फिलहाल इम्युनिटी नहीं है. ऐसे में 3 हफ्तों का लॉकडाउन खुलने के बाद जैसे ही लोग बाहर निकलेंगे और संपर्क में आएंगे, वे भी बीमार हो सकते हैं, बशर्तें 3 हफ्तों के भीतर कोई इलाज न मिल जाए. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि लॉकडाउन बेकार है. इससे हमें योजनाएं बनाने के लिए वक्त मिल सकेगा और आने वाले दिनों में कम इंफेक्शन दिखेंगे. इस वक्त के बाद हम समस्याओं से घिरे होंगे.

इसलिए, हमें अगले कुछ महीनों में दूरदराज के ग्रामीण इलाकों सहित पूरे देश में बीमारी के विस्फोट के लिए तैयार रहना होगा. इनमें से कई वो जगहें होंगी, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर हैं. औसतन, हमारे पास चीन की तुलना में प्रति व्यक्ति 1/8 अस्पताल हैं. ये अपने-आप में डराने वाला है. लेकिन ये सुविधा भी ज्यादा संपन्न इलाकों में है.

देश के बहुत इलाकों में बिना मेडिकल की पढ़ाई किए डॉक्टर काम कर रहे हैं. लेकिन तब भी ये प्रचलित बीमारियों का इलाज जानते हैं या फिर जानते हैं कि कब क्या दवा दी जाए. अब COVID-19 के मरीज उनके पास बीमारी की पहचान और इलाज के लिए पहुंचेंगे. वे इसके लिए तैयार नहीं हैं. बीमारी ठीक न होने पर जबतक मरीज अस्पताल पहुंचेंगे, वायरस फैलता जाएगा.

इस मुश्किल को कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

सबसे पहले, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करें कि हर घर में कम से कम एक व्यक्ति हो जो बीमारी के प्रमुख लक्षणों को जानता हो. दूसरा, ये जागरुकता लाना कि कुछ लोग बहुत कोशिश के बाद भी बावजूद संक्रमित हो सकते हैं. इससे हम सामाजिक बहिष्कार या बीमारी छिपाने से बच सकेंगे. हालात का सामने आना जरूरी है. तीसरा, रिपोर्ट करने के लिए हॉटलाइन, ANM और आशा वर्कर्स आदि.

चूंकि गांवों में काम करने वाले हेल्थ वर्कर्स के पास कोई डिग्री नहीं, ऐसे में उन्हें ट्रेनिंग दिए जाने की जरूरत है ताकि बीमारी को पहचानकर वे संबंधित अधिकारी को बता सकें. पांचवां, यह पक्का करें कि रिपोर्ट्स की जल्द से जल्द तुलना हो. इससे पता चल सकेगा कि बीमारी का अगला हमला कहां हो सकता है. देशभर के मामलों पर नजर रखी जाए ताकि ट्रेंड पता चल सके.

हर राज्य में एक मोबाइल टीम हो, जिसमें डॉक्टर, नर्सें और दूसरा स्टाफ हों. इनके पास टेस्ट किट, वेंटिलेटर और दूसरे उपकरण होने चाहिए. जहां भी कोरोना पॉजिटिव केस ज्यादा बढ़ते लगें, वहां ये टीम पहुंच जाए और जांच और इलाज शुरू कर दे. अगर अभी का लॉकडाउन सफल होता है, तो भी बहुत मुमकिन है कि इसके बाद अलग-अलग जगहों पर बीमारी दिखेगी, जबकि कहीं पर इसका विस्फोट भी होगा. इसी स्थिति में ये मोबाइल टीम काम आ सकती है जो अलग-अलग लोकेशनों पर तैनात रहेगी.

इस टीम को बनाने के लिए और ये पक्का करने के लिए कि इसके पास सभी जरूरी उपकरण हों, इसके लिए सारे हेल्थ प्रोफेशनल्स को मिलकर काम करने की जरूरत है. सरकारी और निजी दोनों ही हेल्थ प्रोफेनशनल्स को जहां जरूरत हो उपलब्ध होना होगा और निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों को हालात संभालने होंगे.

सोशल ट्रांसफर स्कीम को ज्यादा बेहतर तरीके से लागू करना होगा. इसके बगैर अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी और लोगों के पास नियम तोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा. फिलहाल सरकार जो बंदोबस्त कर रही है, वो नाकाफी है. अगर हम ये नहीं चाहते कि लोग काम की तलाश में बाहर निकलें और बीमारी को फैलाएं तो हमें बेहतर आर्थिक मदद देनी चाहिए.

इसके अलावा- योजनाओं के लिए पात्रता भ्रमित करने वाली है (जैसे किसान कौन है) और इनमें कई खामियां हैं. ये सामान्य समय नहीं. इसलिए हम एक यूनिवर्सल कवरेज दे सकते हैं और ऐसे तरीके खोज सकते हैं, जिससे वे लोग, जिन्हें जरूरत नहीं, वे खुद ही मदद लेने से इनकार कर दें. जनधन, आधार और मोबाइल जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल का यही सही समय है. सरकार सीधे जरूरतमंदों के खाते में पैसे जमा करवा सकती है.

सबसे आखिर में, जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती, युद्ध के हालातों जैसी कोशिश के लिए तैयार रहना होगा. इसके बाद जितना हो सके, लोगों को इसका टीका दिया जाए. इसके बाद अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को सुधारने पर ध्यान दे सकते हैं ताकि अगला मौका आए तो हम तैयार रहें.

(दोनों ही लेखक Massachusetts Institute of Technology में अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं. नोबेल पुरस्कार विजेताओं का ये लेख The Indian Express से लिया गया है. अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ें.)

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