शिक्षक और छात्र जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन रही है ‘साइंस ऑफ हैप्पीनेस’
एसजीएसआईटीएस में पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम “द जॉयफुल एजुकेटर” का सफल आयोजन तेजी से बदलते शैक्षणिक परिवेश, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव, भावनात्मक चुनौतियों एवं तकनीकी बदलावों के इस दौर में केवल विषयगत ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के समग्र कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
एसजीएसआईटीएस में पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम “द जॉयफुल एजुकेटर” का सफल आयोजन
तेजी से बदलते शैक्षणिक परिवेश, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव, भावनात्मक चुनौतियों एवं तकनीकी बदलावों के इस दौर में केवल विषयगत ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के समग्र कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए श्री गोविंदराम सेकसरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (एसजीएसआईटीएस), इंदौर के रेखी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर द साइंस ऑफ हैप्पीनेस द्वारा 1 से 5 जून 2026 तक पांच दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम “The Joyful Educator: Experiential Well-Being and Applied Positive Psychology” का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक एवं छात्र समुदाय के समक्ष उपस्थित मानसिक, भावनात्मक एवं व्यवहारिक चुनौतियों को समझते हुए उनके वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करना था। कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों एवं शिक्षाविदों ने सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ रेखी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर द साइंस ऑफ हैप्पीनेस की केंद्राध्यक्ष डॉ. सारिका तिवारी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने बताया कि आज की शिक्षा व्यवस्था में ‘हैप्पीनेस साइंस’ केवल एक अवधारणा नहीं बल्कि भविष्य की आवश्यकता है, जो शिक्षकों और विद्यार्थियों दोनों को अधिक संतुलित, सृजनात्मक एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने में सहायता प्रदान करती है।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. भारत रावत, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ एवं लाइफस्टाइल कोच, मेडांटा हॉस्पिटल, इंदौर थे। उन्होंने अपने विशिष्ट व्याख्यान में खुशी की सरल परिभाषा प्रस्तुत करते हुए कहा कि वास्तविक सुख सरलता, स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली में निहित है। उन्होंने प्रतिभागियों को “Be Simple, Be Natural, Easily Available, Inexpensive and Socially Acceptable” के जीवन दर्शन को अपनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एसजीएसआईटीएस के निदेशक प्रो. नितेश पुरोहित ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, विशेषकर भगवद्गीता, उपनिषद एवं अन्य प्राचीन ग्रंथों में वर्णित आनंद एवं संतुलित जीवन की अवधारणा आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि भविष्य की शिक्षा केवल ज्ञान हस्तांतरण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विद्यार्थियों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता, लचीलापन (Resilience), सकारात्मक सोच और जीवन कौशल विकसित करना भी शिक्षकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी।
प्रो. पुरोहित ने कहा कि “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीकों के युग में भी मानवीय संवेदनाएं, सहानुभूति, मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मक संबंध ही शिक्षा की वास्तविक शक्ति बने रहेंगे। ऐसे में ‘साइंस ऑफ हैप्पीनेस’ शिक्षकों को अधिक प्रभावी, प्रेरणादायी एवं संवेदनशील शिक्षक बनने में सहायता प्रदान करती है, जिसका प्रत्यक्ष लाभ विद्यार्थियों के सीखने के परिणामों पर पड़ता है।”
इस पांच दिवसीय कार्यक्रम के प्रमुख विशेषज्ञ एवं फेसिलिटेटर डॉ. हरि कृष्णा एवं डॉ. ऋतु शर्मा (रेखी फाउंडेशन) रहे। उन्होंने प्रतिभागियों को न्यूरोसाइंस, बिहेवियरल साइंस, माइंडफुलनेस, मेडिटेशन तथा पॉजिटिव साइकोलॉजी के वैज्ञानिक सिद्धांतों को अत्यंत सरल एवं अनुभवात्मक गतिविधियों के माध्यम से समझाया।
डॉ. हरि कृष्णा ने “Understanding Happiness”, “Train the Brain”, “Connect and Find Meaning”, “Adapt, Recover and Thrive” जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों एवं प्रेरणादायी व्यक्तित्वों जैसे बिल गेट्स, विराट कोहली, लियोनेल मेसी, रोजर फेडरर एवं अमिताभ बच्चन के जीवन उदाहरणों के माध्यम से लचीलापन, आत्म-प्रेरणा, सृजनात्मकता और जीवन के उद्देश्य की महत्ता को रेखांकित किया।
डॉ. ऋतु शर्मा ने माइंडफुलनेस एवं भावनात्मक जागरूकता के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए प्रतिभागियों को व्यावहारिक ध्यान अभ्यासों के माध्यम से वर्तमान क्षण में जीने, तनाव कम करने तथा एकाग्रता बढ़ाने की प्रभावी तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने बताया कि माइंडफुलनेस केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कक्षा शिक्षण, निर्णय क्षमता, संवाद कौशल तथा विद्यार्थियों के साथ सकारात्मक संबंध निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने माइंडफुलनेस मेडिटेशन, RAIN (Recognize, Allow, Investigate, Nurture) पद्धति, पॉजिटिव साइकोलॉजी, न्यूरोप्लास्टिसिटी, ब्रेन रीवायरिंग, इमोशन रेगुलेशन तथा ‘हैप्पी एजुकेटर’ की अवधारणा पर विस्तृत चर्चा की। विभिन्न अनुभवात्मक गतिविधियों, समूह चर्चाओं एवं आत्म-चिंतन अभ्यासों के माध्यम से प्रतिभागियों को मानसिक संतुलन, भावनात्मक सुदृढ़ता तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने के व्यावहारिक उपाय सिखाए गए।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि एक खुश एवं मानसिक रूप से स्वस्थ शिक्षक विद्यार्थियों में बेहतर सीखने की प्रेरणा, सकारात्मक कक्षा वातावरण, रचनात्मक सोच तथा उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों को प्रोत्साहित करता है। ऐसे कार्यक्रमों का प्रभाव प्रतिभागियों के परिवारों तक भी पहुंचता है, जिससे सामाजिक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन की संभावना बढ़ती है।
समापन अवसर पर प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कार्यक्रम से उन्हें तनाव प्रबंधन, भावनात्मक नियंत्रण, आत्म-जागरूकता एवं सकारात्मक जीवन दृष्टिकोण विकसित करने में महत्वपूर्ण सहायता मिली। अनेक प्रतिभागियों ने माइंडफुलनेस और इमोशन रेगुलेशन अभ्यासों के प्रत्यक्ष लाभों को साझा किया।
कार्यक्रम के समापन पर रेखी फाउंडेशन के विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को जीवन, नेतृत्व, मानसिक स्वास्थ्य एवं सकारात्मक मनोविज्ञान से संबंधित महत्वपूर्ण पुस्तकों के अध्ययन हेतु प्रेरित किया।
कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वय रेखी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर द साइंस ऑफ हैप्पीनेस की टीम द्वारा किया गया। अंत में केंद्र की समन्वयक प्रो. गौरी गुप्ता ने सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर श्री सोनू एरेन, श्री आशीष सिंह बैस, सुश्री आम्रपाली खोबरागड़े सहित विभिन्न संस्थानों के शिक्षक एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।

28 सितंबर, सोमवार
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