देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रही मिशनरियां, समाज सेवा की आड़ में चल रहा मतांतरण का खेल
बिना अनुमति और गुपचुप ढंग से चल रहे अवैध बाल गृहों से बच्चों का गायब होना बड़ी चिंता, विदेशी फडिंग का मतांतरण में उपयोग समाज और राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है।
- बिना अनुमति और गुपचुप ढंग से चल रहे अवैध बाल गृहों से बच्चों का गायब होना बड़ी चिंता, विदेशी फडिंग का मतांतरण में उपयोग समाज और राष्ट्र के लिए नुकसानदेह है।
- बाल गृहों में मतांतरण से लेकर यौन शोषण और मानव तस्करी का खेल
- सेवा की आड़ में ऐसी अवैध गतिविधियां सुरक्षा के लिए बड़ा संकट
- अन्य तरीकों से मिल रही विदेशी फंडिंग
इंदौर। बाल संरक्षण गृह या आश्रम का अर्थ एक ऐसी जगह से है, जहां बच्चे सुरक्षित रह सकें। प्रदेश में अवैध रूप से चल रहे कई बाल गृहों का जो सच छापे और जांच के बाद सामने आ रहा है, वो कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है। ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं, जो कल्पना से भी परे हैं। इनका सबसे बुरा पहलू यह है कि यहां पर मतांतरण से लेकर बच्चों का यौन शोषण और मानव तस्करी जैसी गतिविधियां भी संचालित होने की बात सामने आई है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और इंदौर जैसे शहरों में हाल ही मे मिले अवैध बाल गृहों के मामले में ऐसा ही कुछ नजर आ रहा है। इन बाल गृहों को लेकर नित नए खुलासे हो रहे हैं। सेवा की आड़ में ऐसी अवैध गतिविधियां सामाजिक ताने-बाने और सुरक्षा के लिए बड़ा संकट बन चुकी हैं। विदेशी फंड का इस प्रकार की अवैध गतिविधियों में इस्तेमाल होना समाज और राष्ट्र के लिए नुकसानदेह तो है ही, यह गलत संदेश भी दे रहा है
भोपाल में अवैध रूप से संचालित आंचल बाल गृह के मामले में सामने आया कि यहां 68 बच्चियों का नामांकन हुआ था लेकिन उनमें से 26 बच्चियां गायब हैं। इस बालगृह को चलाने वाले संचालक अनिल मैथ्यू को इन लड़कियों के बारे में पता तक नहीं है कि वो आखिर गईं तो कहां? इस बालगृह में छह से 18 साल की बच्चियां और किशोरियां रहती हैं, जिसमें से अधिकांश हिंदू हैं।
यहां चल रही अनियमितताओं की सूचना जब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो को मिलीं, तो उन्होंने चार जनवरी को यहां छापा मारा। उन्हें यहां तमाम तरह की अनियमितताएं मिलीं। उन्होंने खुद इसकी सूचना इंटरनेट मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक की।
यह मामला इतना बढ़ चुका है कि इसमें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने प्रशासन से तुरंत कठोर कदम उठाने का आग्रह किया है। भोपाल के इस बाल गृह को संजीवनी सर्विसेस सोसायटी द्वारा संचालित किया जाता है। यह बाल गृह विदेशी दानदाताओं की मदद से बना था। संजीवनी सर्विसेस सोसायटी को जर्मनी से लगातार करोड़ों रुपये की फंडिंग मिली है, जिसके साक्ष्य भी सामने आ गए हैं।
पहले भी सामने आ चुके हैं मामले
विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग का कोई यह पहला मामला नहीं है। इस तरह के कई मामले पहले भी आ चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय कई ईसाई मिशनरी संगठनों को विदेशी अनुदान विनियमन अधिनियम के तहत मिली चंदा लेने की अनुमति रद भी कर चुका है। इसके बाद भी ये अन्य तरीकों से विदेशी फडिंग प्राप्त करते हैं। जब भारत सरकार या राज्य सरकार विदेशी फंडिंग पर किसी तरह की रोक लगाते हैं तो मिशनरी से जुड़े संगठन खूब हाय-तौबा मचाते हैं।
यह सही है कि भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपने पंथ के प्रचार का भी अधिकार शामिल है। हर अधिकार की तरह इस अधिकार की भी कुछ सीमाएं हैं। यह जानना भी जरूरी है कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में दिया गया था।
दरअसल स्वतंत्रता के समय भारत आर्थिक रूप से संपन्न देश नहीं था और वित्तीय सहायता के लिए विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर निर्भर था। भारत को मिशनरियों के आगे झुकना पड़ा और संविधान में अपने पंथ के प्रचार का अधिकार कुछ पाबंदियों के साथ दिया गया। मतांतरण के लिए पैसे का इस्तेमाल तो स्वतंत्रता से पहले से भी होता था, परंतु स्वतंत्रता के बाद और भी बहुत तरह के प्रयोग किए जाने लगे।
मिशनरियों ने अपने अनुभवों से पाया कि भारतीय धर्मों के लोग अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं से भावनात्मक तौर पर इतने गहरे जुड़े हैं कि समस्त प्रयासों के बावजूद बड़ी संख्या में मतांतरण संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में उन्होंने सेवा के सहारे अपने मंसूबों को पूरा करने के प्रयास शुरू किए। हजारों शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, सामाजिक सेवा केंद्रों का विस्तार पूरे भारत में किया गया। उसी का नतीजा है कि आज देश की तीस प्रतिशत शिक्षा एवं 22 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर मिशनरियों का अधिकार है। चर्चों के पास पूरे देश में पाश इलाकों में कीमती जमीनें है।
देश की सुरक्षा के लिए बन रहे चुनौती
ये मिशनरियां अपने संस्थानों के इस्तेमाल से गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों को विभिन्न प्रकार की सहायता देकर मतांतरण के लिए प्रेरित करते हैं। सेवा की आड़ में चल रही इस प्रकार की गतिविधियों पर पूरी तरह से नियंत्रण आवश्यक है। यह तभी संभव है जब विदेशी चंदे पर सख्ती से रोक लगाई जाए। अवैध गतिविधि में लिप्त मिशनरी या अन्य संगठनों पर सख्त पाबंदी की आवश्यकता है। बाल गृहों में बच्चों का शोषण और मतांतरण सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने के साथ देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहा है।
गांधीजी ने जताई थी नाराजगी
भारत में ईसाई मिशनरियों ने अपनी गतिविधियां ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ही बढ़ाना शुरू कर दी थीं। उस दौर में भी हिंदू देवी-देवताओं के लिए बेहद अपमानजनक शब्दों का उपयोग किया जाता था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी अपने संस्मरणों में राजकोट में उनके स्कूल के बाहर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में लिखे गए अपमानजनक शब्दों का उल्लेख किया है। गांधीजी जीवन भर ईसाई मिशनरियों द्वारा सेवा कार्यों के नाम पर किए जाने वाले मतांतरण के विरुद्ध रहे। जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो ईसाई मिशनरी के संगठनों ने प्रश्न उठाया कि स्वतंत्र भारत में क्या उन्हें मतांतरण की अनुमति दी जाएगी, तो गांधीजी ने इसका जवाब न में दिया था। गांधीजी के अनुसार लोभ-लालच के बल पर मतांतरण करना घोर अनैतिक है।
कानून बनने से लगी है लगाम
जबरन मतांतरण को लेकर कई राज्यों ने कानून भी बना दिए है। मध्य प्रदेश में भी धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2020 लागू है। इस तरह का कानून मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड सहित कई अन्य राज्यों में भी बने हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने इस कानून में कई तरह प्रावधान किए गए है।
बहला-फुसलाकर, धमकी देकर जबरदस्ती मतांतरण और शादी करने पर 10 साल की सजा का प्रावधान भी इसमें है। यह गैर जमानती अपराध होगा।
मतांतरण और मतांतरण के बाद होने वाले विवाह के दो महीने पहले कलेक्टर को धर्मांतरण और विवाह करने व करवाने वाले दोनों पक्षों को लिखित में आवेदन देना होगा।
बगैर आवेदन दिए मतांतरण करवाने वाले धर्मगुरु, काजी, मौलवी या पादरी को भी पांच साल तक की सजा का प्रावधान है।
मतांतरण और जबरन विवाह की शिकायत पीड़ित, माता-पिता, परिजन या अभिभावक द्वारा की जा सकती है।
सहयोग करने वालों को भी मुख्य आरोपित बनाया जाएगा। उन्हें अपराधी मानते हुए मुख्य आरोपित की तरह ही सजा होगी।
जबरन मतांतरण या विवाह कराने वाली संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन रद किया जाएगा।
अपने धर्म में वापसी करने पर इसे मतांतरण नहीं माना जाएगा।

28 सितंबर, सोमवार
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