दो या दो से अधिक समुदायों की मौजूदगी के बिना आईपीसी की धारा 153ए के तहत अपराध नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार के खिलाफ मामला रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153ए के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक घटक दो या दो से अधिक समूहों या समुदायों के बीच दुश्मनी और वैमनस्य की भावना पैदा करना है, ऐसा न करने पर आईपीसी की धारा 153ए के तहत कोई अपराध नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153ए के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक घटक दो या दो से अधिक समूहों या समुदायों के बीच दुश्मनी और वैमनस्य की भावना पैदा करना है, ऐसा न करने पर आईपीसी की धारा 153ए के तहत कोई अपराध नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा
“आईपीसी की धारा 153ए की भाषा को पढ़ने से यह स्पष्ट है कि इस तरह के अपराध का गठन करने के लिए अभियोजन पक्ष को मामला सामने लाना होगा कि अभियुक्तों के लिए बोले गए या लिखे गए शब्दों ने दुश्मनी पैदा की या धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच मनमुटाव, या कथित कृत्य सद्भाव बनाए रखने के लिए प्रतिकूल है।”
जस्टिस बीआर गवई द्वारा लिखित फैसले में उपरोक्त टिप्पणी उत्तराखंड स्थित पर्वतजन समाचार पोर्टल संचालक शिव प्रसाद सेमवाल की याचिका पर फैसला करते समय आई, जिन्होंने उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 153ए के तहत लंबित आपराधिक मामला रद्द करने से इनकार करने के हाईकोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई।
शिकायतकर्ता फाउंडेशन चलाता है और उसने उक्त भूमि/संपत्ति पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा ‘मातृ आश्रय-एक संग्रह संग्रहालय’ के शिलान्यास समारोह की योजना बनाई।
अपीलकर्ता के खिलाफ आरोप लगाया गया कि उन्होंने ई-समाचार पत्र ‘पर्वतजन’ में लेख प्रकाशित किया। उक्त लेख में यह दर्शाया गया कि जिस भूमि पर आधारशिला रखने का प्रस्ताव किया गया, वह सरकारी भूमि है, जिस पर शिकायतकर्ता द्वारा अवैध रूप से कब्जा/अतिक्रमण किया गया।
अन्य प्रावधानों के अलावा, अपीलकर्ता के खिलाफ आईपीसी की धारा 153ए का प्रावधान यह आरोप लगाते हुए लगाया गया कि अपीलकर्ता की ऑनलाइन पोस्ट ने पहाड़ी समुदाय के लोगों और मैदानी इलाकों के लोगों के बीच दुश्मनी और वैमनस्य की भावना पैदा की।
हालांकि, अदालत शिकायतकर्ता के आरोप से आश्वस्त नहीं थी, क्योंकि आईपीसी की धारा 153ए के तहत अपराध का गठन करने के लिए आवश्यक मूलभूत तथ्य एफआईआर में लगाए गए आरोपों से गायब हैं।
अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता द्वारा अपने पोस्ट में इस्तेमाल की गई पंक्तियां केवल शिकायतकर्ता को संदर्भित करती हैं, यह आरोप लगाते हुए कि उसकी गतिविधियां पहाड़ियों के लिए हानिकारक हैं।
अदालत ने कहा, “इन शब्दों का किसी समूह या लोगों या समुदायों के समूह से कोई संबंध नहीं है।”
अदालत ने कहा,
“मंजर सईद खान बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में इस न्यायालय ने माना कि आईपीसी की धारा 153ए को लागू करने के लिए दो या दो से अधिक समूहों या समुदायों की उपस्थिति आवश्यक है, जबकि वर्तमान मामले में ऐसे कोई समूह या समुदाय नहीं हैं। समाचार लेख में इसका उल्लेख किया गया।”
इस प्रकार, भजन लाल मामले पर भरोसा करते हुए अदालत ने माना कि अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है, क्योंकि एफआईआर में लगाए गए आरोप किसी भी संज्ञेय अपराध के लिए आवश्यक सामग्री का खुलासा नहीं करते।
तदनुसार, अपील की अनुमति दी गई और अपीलकर्ता के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला रद्द कर दिया गया।
केस टाइटल: शिव प्रसाद सेमवाल बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य
Criminal Appeal No(s).__ of 2024 arising out of SLP (Crl.) No(s). 3687 of 2020]

28 सितंबर, सोमवार
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