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3 तलाक को कोर्ट ले जाने वाली शाहबानो का संघर्ष, 33 साल बाद न्याय अब बड़े पर्दे पर दुनिया देखेगी
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3 तलाक को कोर्ट ले जाने वाली शाहबानो का संघर्ष, 33 साल बाद न्याय अब बड़े पर्दे पर दुनिया देखेगी

Shah Bano Case: इंदौर की शाह बानो के संघर्ष ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की नींव रखी। साल 1985 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दहलीज पर एक नई बहस छेड़ दी थी।

Abhishek Raghuvanshi7 नवंबर 2025 · 1 मिनट पढ़ें
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Shah Bano Case: इंदौर की शाह बानो के संघर्ष ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की नींव रखी। साल 1985 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दहलीज पर एक नई बहस छेड़ दी थी। 33 साल बाद, जब 2019 में ट्रिपल तलाक को अवैध घोषित करने वाला कानून लागू हुआ, तो यह शाहबानो की जीत का प्रतीक था। अब ये संघर्ष बड़े पर्दे पर उतर रहा है। यामी गौतम और इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म ‘हक’ के जरिए अब दुनिया देखेगी 3 तलाक को कोर्ट ले जाने वाली शाहबानो के संघर्ष की कहानी…।

Shah Bano Case इंदौर की शाह बानो के संघर्ष की कहानी… अब दुनिया देखेगी….

तस्वीरों में खबर5 फोटो

Shah Bano Case: भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो न सिर्फ कानूनी किताबों में दर्ज हैं, बल्कि उनके जीवन के संघर्ष लोगों के मन को भी झकझोर देते हैं। शाह बानो बेगम का नाम इन्हीं में से एक है। इंदौर की शाह बानो के संघर्ष ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की नींव रखी। साल 1985 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दहलीज पर एक नई बहस छेड़ दी थी। तीन तलाक की प्रथा के खिलाफ उनकी लड़ाई ने न सिर्फ व्यक्तिगत न्याय की मांग की, बल्कि पूरे समुदाय के लिए एक मिसाल बन गई। 33 साल बाद, जब 2019 में ट्रिपल तलाक को अवैध घोषित करने वाला कानून लागू हुआ, तो यह शाहबानो की जीत का प्रतीक था। अब ये संघर्ष बड़े पर्दे पर उतर रहा है। यामी गौतम और इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म ‘हक'(Film Haq) के जरिए अब दुनिया देखेगी 3 तलाक को कोर्ट ले जाने वाली शाहबानो के संघर्ष की कहानी…।

एक साधारण जीवन का असाधारण मोड़

शाह बानो का जन्म 1916 में मध्य प्रदेश के इंदौर में एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था। 1932 में मात्र 16 साल की उम्र में मोहम्मद अहमद खान से उनकी शादी हो गई। अहमद खान इंदौर के एक सफल वकील थे। इनकी कमाई से परिवार का भरण-पोषण आसानी से हो जाता था। शाह बानो ने अपना पूरा जीवन एक गृहिणी के रूप में बिताया, पांच बच्चों की परवरिश की, घर संभाला और पति की दूसरी शादी को भी चुपचाप स्वीकार कर लिया। शाह बानो के जीवन में चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब साल 1978 में 62 साल की उम्र में उनके पति अहमद खान ने उन्हें तीन तलाक दे दिया।शाह बानो ने शुरू की हक की लड़ाई

शाह बानो ने शुरू की हक की लड़ाई

साल 1978 में 62 साल की उम्र में शाह बानो को उनके पति अहमद खान ने तीन तलाक दे दिया 

तीन बार ‘तलाक’ कहकर अहमद खान ने शाह बानो को घर से निकाल दिया। तलाक के बाद उन्होंने सिर्फ 500 रुपए का महर दिया और कहा कि अब उनका कोई अधिकार नहीं बचा। बिना किसी आय के बुजुर्ग शाह बानो और उनके बच्चे भुखमरी के कगार पर पहुंच गए। बावजूद इसके शाह बानो ने हार नहीं मानी। उन्होंने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत इंदौर की एक निचली अदालत में गुजारा भत्ता मांगने के लिए याचिका दायर की और अपने हक की लड़ाई की शुरुआत की। यह धारा सभी नागरिकों को भरण-पोषण का अधिकार देती है। निचली अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया लेकिन खान ने अपील की। मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट (फोटो- एएनआई)

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, तत्कालीन चीफ जस्टिस वाई.वी. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। 23 अप्रैल 1985 को, अदालत ने शाह बानो को मासिक 179.20 रुपए का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा, ‘धारा 125 का उद्देश्य उन लोगों को त्वरित न्याय देना है जो, खुद का भरण-पोषण नहीं कर सकते। धर्म कोई अंतर नहीं डालता।’ अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाकशुदा पत्नी को तीन महीने के बाद भरण-पोषण न देना क्रूरता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बताया धार्मिक कानूनों पर हमला

सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ शाह बानो की जीत नहीं थी, यह संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक कानूनों के बीच टकराव की पहली बड़ी चुनौती थी। मुस्लिम संगठनों ने इसे धार्मिक कानूनों पर हमला बताया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1986 में मुस्लिम वुमन एक्ट पारित किया, जो शाह बानो के फैसले को कमजोर करने वाला था। इस कानून ने तलाकशुदा महिलाओं को केवल इद्दत (90 दिन) तक भरण-पोषण सीमित कर दिया। शाह बानो पर दबाव डाला गया कि वे फैसले को स्वीकार करें। शाह बानो ने साफ कहा -‘मैं न्याय के लिए लड़ी हूं, न कि पैसे के लिए।’

33 साल का इंतजार हुआ खत्म

शाह बानो के संघर्ष का असर पूरे देश पर पड़ा। कई मुस्लिम महिलाओं ने इसी तरह के केस लड़ने शुरू किए। दानिशा रेनू, सायरा बानो जैसी महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। आखिरकार, 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया। जस्टिस नरीमन ने कहा, ‘यह प्रथा महिलाओं की गरिमा पर आघात है।’ वहीं इसके बाद 2019 में पीएम मोदी की सरकार ने मुस्लिम वुमन एक्ट लागू किया जो, तीन तलाक को अपराध बताता है। 33 साल बाद हुआ ये फैसला शाह बानो के सालों के संघर्ष का परिणाम था। ये फैसला पीढ़ियों की पीड़ा को हमेशा के लिए खत्म करने वाली थी। आज लाखों मुस्लिम महिलाएं इस कानून के दम पर अपनी आवाज उठा रही हैं।

अब बड़े पर्दे पर दुनिया देखेगी शाहबानो के संघर्ष की कहानी

अब शाह बानो के संघर्ष की कहानी बड़े पर्दे पर नजर आएगी। सुपर्ण एस. वर्मा द्वारा निर्देशित ‘हक’ फिल्म 7 नवंबर 2025 को रिलीज हो रही है। यह फिल्म शाह बानो केस से प्रेरित है। फिल्म में काल्पनिक पात्रों के रूप में यामी गौतम शाजिया बानो का किरदार निभा रही हैं। वहीं इमरान हाशमी अब्बास के किरदार में दिखेंगे। फिल्म कोर्टरूम ड्रामा के रूप में बनाई गई है।

रिलीज से पहले रोक की उठी मांग

मुस्लिम महिलाओं को भी भरण-पोषण की राशि पाने के अधिकार की नींव जिस शाहबानो केस से पड़ी थी, उस पर बनी फिल्म हक(Film Haq) को रिलीज से पहले विवादों का सामना करना पड़ा। शाहबानो की बेटियों ने फिल्म पर ऐतराज जताया था कि फिल्म में उनकी मां के निजी जीवन को दिखाया गया है।

shah bano case movie (फोटो सोर्स : सोशल मीडिया)

सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष करने वाली इंदौर की महिला शाहबानो की बेटियों ने फिल्म पर ऐतराज जताया है कि फिल्म में उनकी मां के निजी जीवन को दिखाया गया है। फिल्म बनाने के लिए उनसे अनुमति नहीं ली गई। इस कारण फिल्म हक की 7 नवंबर को रिलीज पर रोक लगाने की मांग की गई। हालांकि 6 नवंबर को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शाहबानो केस पर आधारित फिल्म हक की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

इंडिगो की सुबह 11.45 बजे पुणे फ्लाइट दोपहर सवा तीन घंटा देरी से 3.33 बजे इंदौर से निकली। पुणे से साढ़े तीन घंटा देरी से शाम 6.38 बजे ये फ्लाइट इंदौर पहुंची। पुणे से आने के बाद शाम 7.10 बजे चेन्नई के यात्री इस फ्लाइट से रवाना हुए।

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