SC/ST Act | चार-दीवारी के भीतर जातिसूचक टिप्पणी करने पर अपराध नहीं बनेगा: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी SC/ST Act के तहत अपराध नहीं होगी, जब तक कि ऐसी टिप्पणी सार्वजनिक दृश्य या किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं की जाती।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी SC/ST Act के तहत अपराध नहीं होगी, जब तक कि ऐसी टिप्पणी सार्वजनिक दृश्य या किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं की जाती।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि एक्ट के तहत अपराध गठित करने के लिए अपमान या धमकी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित पीड़ित के कारण होनी चाहिए। इसके अलावा, प्रावधानों का अन्य महत्वपूर्ण घटक सार्वजनिक दृश्य के भीतर अपमान या धमकी किसी भी स्थान पर होनी चाहिए।”
कोर्ट ने हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2021) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें इमारत की चार दीवारों के भीतर शिकायतकर्ता से दुर्व्यवहार करने के आरोप है। घटना के समय जनता का कोई अन्य सदस्य नहीं था और यह माना गया कि मूल तत्व यह है कि शब्द “सार्वजनिक दृश्य के भीतर किसी भी स्थान पर” बोले गए। उस हद तक आरोप-पत्र न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया।
जस्टिस गुप्ता, ने कहा कि “धारा 3(1)(एस) को आकर्षित करने वाली सामग्रियां हैं:
(i) अभियुक्त अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है; जबकि संबंधित व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, वह अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का है।
(ii) आरोपी ने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जाति के नाम से अपमानित किया।
(iii) किसी सार्वजनिक स्थान पर।
(iv) सार्वजनिक दृश्य के भीतर।”
पीठ के समक्ष विशेष न्यायाधीश, लुधियाना के आदेश के खिलाफ अपील की गई, जिसमें हत्या के मामले और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302, 307, 323 और SC/ST Act की धारा 3 और 4 के तहत जातिवादी टिप्पणी पारित करने के अपराध में अग्रिम जमानत की याचिका दायर की गई, जिसे खारिज कर दिया गया।
यह आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने बैंक्वेट हॉल खरीदने के लिए सेवक सिंह को “औकात” बताकर जातिवादी टिप्पणी की। उसके बाद अपीलकर्ता के पति ने अपनी कार से सिंह को मारकर गंभीर चोटें पहुंचाईं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो गई।
याचिकाकर्ता के वकील की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर में उनकी कोई भूमिका नहीं है। पूरे आरोप अपीलकर्ता के पति पर हैं, जिन्हें पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।
प्रस्तुत प्रस्तुतियों पर विचार करते हुए न्यायालय ने हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य, (2020) का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एक्ट का उद्देश्य उल्लंघन करने वालों को दंडित करना है, जो समाज के कमजोर वर्ग के खिलाफ अपमान और उत्पीड़न करते हैं। इस प्रकार, एक्ट का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग के खिलाफ उच्च जाति के कृत्यों को दंडित करना है, क्योंकि वे एक विशेष समुदाय से संबंधित हैं।
न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि SC/ST Act की धारा 18 और 18ए यह प्रावधान करती है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के प्रावधान अपराध के आरोप में किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी से जुड़े किसी भी मामले के संबंध में लागू नहीं होंगे। SC/ST Act के तहत अपराध है, लेकिन अदालत को इस बात पर विचार करने से रोका नहीं गया कि लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया धारा SC/ST Act के तहत अपराध बनता है या नहीं।
यह देखा गया कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ एकमात्र आरोप यह है कि उसने बैंक्वेट हॉल खरीदने के लिए शिकायतकर्ता की स्थिति के बारे में शब्द कहे और उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।
कोर्ट ने कहा,
“उक्त घटना बैंक्वेट हॉल में हुई, जब केवल शिकायतकर्ता पक्ष अपीलकर्ता और उसके परिवार के सदस्य उपस्थित थे, यानी किसी अन्य सार्वजनिक दृश्य के भीतर नहीं। सवाल उठता है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में एक्ट की धारा 3 के किसी भी प्रावधान या एससी/एसटी अधिनियम की धाराएं आकर्षित होती हैं।”
SC/ST Act, 1989 की धारा 3(1) का अवलोकन करते हुए न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि किसी व्यक्ति को अपराध अत्याचार के लिए दंड के लिए उत्तरदायी बनाने के लिए आवश्यक सामग्रियों में से टिप्पणी “…किसी भी सार्वजनिक स्थान पर; सार्वजनिक दृश्य के भीतर” होनी चाहिए।”
अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में एफआईआर के अवलोकन से पता चलता है कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि आरोपी राजिंदर कौर यानी अपीलकर्ता को पता था कि मृतक सेवक सिंह-शिकायतकर्ता-अनुसूचित जाति का है।
इसके अलावा, अपीलकर्ता द्वारा किसी विशेष जाति का उल्लेख नहीं किया गया, जिससे शिकायतकर्ता का अपमान किया जा सके। आरोप है कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया, बिना यह बताए कि किन शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
इसमें कहा गया,
“किसी विशेष जाति का खुलासा नहीं किया गया। अन्यथा, कथित जातिवादी शब्द बैंक्वेट हॉल में कहे गए, यानी सार्वजनिक दृश्य के किसी भी स्थान पर नहीं।”
उपरोक्त के आलोक में न्यायालय ने राहत दी और निर्देश दिया कि उसकी गिरफ्तारी की स्थिति में कुछ शर्तों के अधीन जमानत दी जाएगी।
अपीयरेंस: तनवीर सिंह अटारीवाला, अपीलकर्ता के वकील, रणदीप सिंह खैरा, डीएजी, पंजाब और मनीष वर्मा, शिकायतकर्ता के वकील।

28 सितंबर, सोमवार
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