यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब देने को कहा है।
यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नोटिस जारी कर 19 मार्च तक जवाब देने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने नए नियम पर रोक लगा दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से एक कमेटी गठित करने पर विचार करने को कहा है। जिसमें एक्सपर्ट शामिल हो। सीजेआई ने कहा कि हमें आजादी मिले 75 साल गुजर चुके हैं और हम जातिगत भेदभाव से अभी भी जूझ रहे है। सीजेआई ने कहा कि अंतरजातीय विवाह हो रहे है और विश्विद्यालयों में छात्र पढ़ते हैं साथ रहते हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि हम अमेरिका जैसे पृथक विश्वविद्यालयों में नही जाएंगे, जहां अश्वेत और श्वेत अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील विनीत जिंदल सहित अन्य ने याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट को बताया कि यूजीसी के नियम 3 (C) गलत है। जैन ने कहा कि इस कानून कि जरूरत क्या थी। वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है। शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का भेदभाव समाज में खाई को बढ़ावा देने वाला है। सीजेआई ने कहा कि हम समानता के अधिकार पर गौर कर रहे हैं। यह नियम खरे उतरते हैं या नहीं। आप उस पर दलील दें। जैन ने कहा कि अनुच्छेद 14 में क्लासिफेक्शन को स्पष्ट किया गया है और सुप्रीम कोर्ट के इस पर फैसले भी हैं जिनमें स्पष्टीकरण है। जैन ने कहा कि सेक्शन 3C अनुच्छेद 14 के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि हम जाति आधारित भेदभाव के इस प्रावधान पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। सीजेआई ने कहा कि मान लीजिए कि दक्षिण का कोई छात्र उत्तर में प्रवेश लेता है या उत्तर का कोई छात्र दक्षिण में दाखिला लेता है। यदि कोई छात्र उसके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है और दोनों पक्षों की जाति ज्ञात नही है, तो कौन सा प्रावधान इसके अंतर्गत आता है? जैन ने कहा कि हां इसके अंतर्गत आता है। याचिकाकर्ता ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 13 जनवरी 2026 को नए नियमों को लागू किया है, जिसके खिलाफ यह याचिका दायर की गई है। इन नियमों का मूल उद्देश्य कैंपस के अंदर जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करना और वंचित वर्ग के छात्रों को सुरक्षित शैक्षणिक परिवेश प्रदान करना था। हालांकि इन नियमों ने ऐसी बहस को जन्म दे दिया, जिसने न केवल छात्र राजनीति को गर्मा दिया है, बल्कि सरकार को भी अपनी राजनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। याचिकाकर्ता की दलील है कि नियम 3 (सी) के तहत जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया है। इसके चलते सामान्य वर्ग से जुड़े लोगों को यदि किसी प्रकार की जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़े तो उन्हें औपचारिक शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नही मिल पाता। दायर याचिका में इसे संविधान के समानता और मौलिक अधिकारों से जुड़ी धाराओं के खिलाफ बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट से नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही यह भी मांग की गई है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में बनाएगए सभी शिकायत निवारण तंत्र जाति निरपेक्ष हो और किसी भी वर्ग के व्यक्ति को भेदभाव करने की शिकायत से वंचित न किया जाए। यूजीडी के नए इक्विटी रूल के तहत सभी विश्वविद्यालयों, कॉलॉजों और उच्च शिक्षण संस्थानों को 24×7 हेल्पलाइन शुरू करनी होगी। इसके साथ ही Equal Opportunity Center की स्थापना करनी होगी। इतना ही नहीं इक्विटी कमिटी और इक्विटी स्क्वाड का गठन करना होगा। यूजीसी ने।स्पष्ट किया है कि नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। वही यूजीसी की दलील है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। यूजीसी के अनुसार रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद ऐसी निगरानी व्यवस्था जरूरी हो गई थी। इसको लेकर दर्जनों याचिका अभी तक दायर की जा चुकी है। दायर सभी याचिकाओं में एक ही मांग है कि लागू नियम को असंवैधानिक घोषित किया जाए।

28 सितंबर, सोमवार
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