इंदौर के ‘बड़े भैया’ की अनसुनी कहानी: मजदूरी से राजनीति तक का सफर, जानिए जिंदगी के 6 ऐसे किस्से जो कम लोग जानते हैं
इंदौर की राजनीति में कई बड़े नेता आए और गए, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो किसी राजनीतिक पद या कुर्सी से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बनाई गई जगह से पहचाने जाते हैं।
इंदौर की राजनीति में कई बड़े नेता आए और गए, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो किसी राजनीतिक पद या कुर्सी से नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बनाई गई जगह से पहचाने जाते हैं। ऐसा ही एक नाम था विष्णु प्रसाद शुक्ला, जिन्हें पूरा इंदौर ‘बड़े भैया’ के नाम से जानता था। आज उनकी जन्मतिथि पर हम आपको बताएंगे उनकी जिंदगी से जुड़े ऐसे छह किस्से, जिनमें संघर्ष है, राजनीति है, समाजसेवा है और कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिनके बारे में आज की पीढ़ी शायद बहुत कम जानती है।
पहला किस्सा – कभी की हम्माली, तो कभी चलाया रनगाड़ा। बड़े भैया की जिंदगी की शुरुआत किसी राजनीतिक परिवार की सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि संघर्षों के बीच हुई थी। उन्होंने अपने जीवन में हम्माली की, रनगाड़ा चलाया और मिल में भी नौकरी की। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था कि दिनभर मेहनत करने के बाद कभी-कभी उनके पास महज 10 रुपये ही बचते थे। यही संघर्ष उन्हें मजदूरों के करीब ले गया। मजदूरों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और धीरे-धीरे वे ‘बड़े भैया’ के नाम से पहचाने जाने लगे।
दूसरा किस्सा – आपातकाल में बिताए 19 महीने जेल में। बड़े भैया का राजनीतिक सफर भी आसान नहीं रहा। वे जनसंघ की विचारधारा से प्रभावित थे और भाजपा के वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खंडेलवाल के संपर्क में आने के बाद सक्रिय राजनीति में आए। आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 19 महीने जेल में बिताने पड़े। यह दौर उनके राजनीतिक जीवन के संघर्षपूर्ण अध्यायों में से एक था।
तीसरा किस्सा – खुद चुनाव हारे, लेकिन दूसरों की जीत के बने रणनीतिकार। बड़े भैया ने खुद दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके। हालांकि, चुनावी रणनीति और संगठन के काम में उनकी मजबूत पकड़ थी। पूर्व सांसद फूलचंद वर्मा ने उनके निधन के बाद बताया था कि 1967 के चुनाव में बड़े भैया ने उनके लिए प्रचार, बूथ प्रबंधन और आर्थिक प्रबंधन तक की जिम्मेदारी संभाली थी। यानी खुद चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन दूसरे नेताओं की जीत में उनकी भूमिका बेहद अहम रही।
चौथा किस्सा – जानापाव को पहचान दिलाने के लिए लिया था संकल्प। बड़े भैया की जिंदगी का एक ऐसा किस्सा भी है, जो उनकी धार्मिक आस्था और संकल्प शक्ति को दर्शाता है। बताया जाता है कि वर्ष 1991 में वे अपने परिवार के साथ भगवान परशुराम की जन्मस्थली जानापाव पहुंचे थे। उस समय पहाड़ी तक पहुंचने का रास्ता बेहद दुर्गम था। इस स्थिति को देखकर उन्होंने संकल्प लिया कि जानापाव तक पहुंचने का रास्ता सुगम करवाएंगे और इस स्थान को धार्मिक पहचान दिलाने के लिए प्रयास करेंगे। उनके परिवार के करीबी श्रीकृष्ण दुबे के अनुसार, करीब 10 वर्षों के प्रयासों के बाद इस दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ।
पांचवां किस्सा – गरीब बेटियों की शादी से लेकर जरूरतमंदों की मदद तक और परिवार की अलग राजनीतिक राहें। बड़े भैया की पहचान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं थी। उनके करीबी बताते हैं कि वे जरूरतमंद परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करते थे और कई परिवारों को गृहस्थी शुरू करने के लिए जरूरी सामान तक उपलब्ध करवाते थे। पूर्व सांसद फूलचंद वर्मा ने भी बताया था कि उनके दरवाजे से कोई गरीब या परेशान व्यक्ति निराश होकर नहीं लौटता था। वहीं, उनके परिवार की राजनीति भी काफी दिलचस्प रही। उनके बेटे संजय शुक्ला ने भाजपा से अलग राजनीतिक राह चुनी और कांग्रेस के टिकट पर इंदौर विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-1 से चुनाव लड़कर विधायक बने। एक ही परिवार में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का होना भी बड़े भैया के परिवार की चर्चा में रहने वाले पहलुओं में से एक रहा।
समापन – एक नाम, जो आज भी याद किया जाता है। 25 अगस्त 2022 को बड़े भैया विष्णु प्रसाद शुक्ला इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी सिर्फ एक राजनीतिक नेता की कहानी नहीं है। यह कहानी उस इंसान की है, जिसने कभी मजदूरी की, मजदूरों के बीच अपनी पहचान बनाई, आपातकाल में जेल गया, चुनाव लड़ा, सामाजिक काम किए और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा आगे रहा। राजनीति में पद और प्रतिष्ठा हासिल करना अलग बात है, लेकिन लोगों के दिलों में जगह बनाना उससे कहीं बड़ी बात होती है। शायद यही वजह है कि आज भी इंदौर में उनका नाम आते ही लोग उन्हें ‘बड़े भैया’ कहकर याद करते हैं। आप तक न्यूज़ 24×7 की ओर से स्वर्गीय विष्णु प्रसाद शुक्ला ‘बड़े भैया’ को उनकी जन्मतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।

28 सितंबर, सोमवार
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