वाराणसी। जिस पत्रकार ने न जाने कितने लोगों की कहानियां अपनी कलम से लिखीं, उनकी अपनी आखिरी कहानी लिखने और अंतिम विदाई देने के लिए कोई अपना मौजूद नहीं था। ऐसे समय में अमन कबीर सेवा न्यास के सदस्यों और समाज के कुछ लोगों ने आगे बढ़कर इंसानियत की मिसाल पेश की। जानकारी के अनुसार संस्था के पास फोन आया कि एक व्यक्ति का निधन हो गया है और परिवार का कोई सदस्य अंतिम संस्कार के लिए मौजूद नहीं है। सूचना मिलने पर संस्था के लोग मौके पर पहुंचे।
पत्नी से भी हुआ था तलाक। परिवार से संपर्क करने का प्रयास किया गया। बताया गया कि उनकी पत्नी से संपर्क करने पर उन्होंने रिश्ते और तलाक की जानकारी दी। अन्य रिश्तेदारों से भी संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन अंतिम समय में कोई परिजन वहां नहीं पहुंचा। मामले की सूचना पुलिस को भी दी गई।

पत्रकारिता का जीवन त्याग और संघर्ष की यात्रा
इस घटना की जानकारी मिलने पर (राइटर एंड जर्नलिस्ट) कान्ति शरण निगम ने अपने एफबी पेज पर पोस्ट किया कि ‘पत्रकार के जीवनकाल में समाज में परिवर्तन तो आता है, लेकिन खुद की खुशियां और पारिवारिक सहयोग अक्सर सच्चे पत्रकारों के जीवन में नहीं होता। इसलिए पत्रकारिता को त्याग, समर्पण, सत्य, निष्ठा और आदर्श से संवारा जाता है। इस कठिन और संघर्ष भरी जीवन यात्रा में पत्रकारिता करने वाले बिरले ही होते हैं।”
मृतक की पहचान विजय शंकर यादव के रूप में हुई। बताया गया कि वह लंबे समय तक पत्रकारिता से जुड़े रहे और लगभग दो वर्षों से सेवानिवृत्त होकर शीरगोवर्धन स्थित एक मकान में रह रहे थे। मृतक के पास आधार कार्ड और एक मीडिया पहचान-पत्र मिला, जिस पर राजनीतिक संवाददाता लिखा था। आधार कार्ड में पता संस्कृत विश्वविद्यालय, संपूर्णानंद, C-27/65, जगतगंज दर्ज था। स्थानीय लोगों के अनुसार उक्त मकान अब बिक चुका है।
जब खून का रिश्ता नहीं, फिर भी इंसानियत ने निभाया रिश्ता
विजय शंकर यादव के अंतिम संस्कार के लिए अंततः अमन कबीर सेवा न्यास के सदस्य आगे आए। संस्था की ओर से उन्हें अपना मानकर हरिश्चंद्र घाट पर हिंदू रीति-रिवाज एवं विधि-विधान के साथ अंतिम
संस्कार कराया गया और मुखाग्नि दी गई। संस्था का कहना है कि ‘जब अपने नहीं आए, तो हम उनके अपने बनकर खड़े रहेंगे। धर्म और इंसानियत सबसे पहले। ‘काशी की धरती पर यह घटना एक बार फिर यह संदेश देती है कि रिश्ते केवल खून से नहीं होते, बल्कि इंसानियत और संवेदना से भी बनते हैं। जिस पत्रकार ने अपने जीवन में दूसरों की आवाज को समाज तक पहुंचाया, उनकी अंतिम यात्रा में कुछ
ऐसे लोग जरूर खड़े रहे, जिनका उनसे कोई खून का रिश्ता नहीं था। फिर भी उन्होंने उन्हें बेगाना नहीं समझा और अंतिम समय में अपना धर्म निभाया।



