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12 जनवरी मंगलवार को देश के महान दार्शनिक और विश्व में भारत के अध्यात्म का डंका बजाने वाले स्वामी विवेकानंद की जयंती आइए जानते हैं

12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जयंती जिसको हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते है। स्वामी विवेकानंद ने बहुत कम उम्र में यह साबित कर दिया था कि युवा उम्र कितनी महत्वपूर्ण है।

Abhishek Raghuvanshi13 जनवरी 2022 · 1 मिनट पढ़ें
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12 जनवरी स्वामी विवेकानंद जयंती जिसको हम राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते है। स्वामी विवेकानंद ने बहुत कम उम्र में यह साबित कर दिया था कि युवा उम्र कितनी महत्वपूर्ण है।30 साल की उम्र में उन्होंने भारत के वेद वेदांत के दर्शन सम्पूर्ण विश्व को करवाया ।इतना ही नही विवेकानंद ने योग विद्या को विश्व के समक्ष बहुत ही मौलिक ढंग से प्रस्तुत किया है।स्वामी विवेकानंद जिनके नाम का सार ही योग है। जिन्होंने योग से शरीर की वर्तमान अवस्था को चेतन में रहते हुए अपने आप में ईष्वरीय अवस्था को विकसित किया जिसका अनुसरण आज पूरा देश करता है और उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मानता है,इस दिन स्कूलों में योग के कार्यकम आयोजित किये जाते है।शरीर की ऊर्जा को एकत्रित करने के उपदेश भी दिए जाते है। लेकिन दूसरे दिन ही योग विद्या भूलकर बच्चों का ज्ञान सिर्फ क़िताबों तक सीमित कर दिया जाता है।12 जनवरी को विवेकानंद के जीवन पर ज्ञान देने वाले अध्यापक दूसरे दिन ही किताबी विषयों पर प्रतिस्पर्धा का ज्ञान देने लगते है।जबकि विवेकानंद ने हमेशा भौतिक ज्ञान से परे वेदों को ही ज्ञान का भंडार कहा है।उन्होंने भक्ति योग,कर्म योग,ज्ञान योग,राज योग,आदि को योग की पद्धतियों द्वारा युवाओं में अध्यात्म और समर्पण की भावना को जागरूक किया है। उनके विचारों में योग विद्या का विशेष महत्व है।ज्ञान ,कर्म और भक्ति उनके व्यक्तित्व में प्रवाहित होती है और राजयोग की पराकाष्ठा उनके जीवन को सूर्य की भांति ऊर्जावान बनाती है।स्वामी विवेकानंद का मूल मंत्र अहं ब्रम्हास्मि,की मौलिक धारणा सम्पूर्ण मानव जाति को अखंडता का आधार प्रदान करती है। उनका मानना था कि जिन्होंने वेद पुराण गीता पढ़ लिया वह किसी भी समस्या को आसानी से हल कर सकता है।बड़े से बड़ा काम कर सकता है। गीता में सारी समस्याओं का निदान है।मेरा यहाँ यह बिल्कुल मतलब नही की बच्चों को किताबी ज्ञान को छोड़कर वेदों का ज्ञान देना चाहिए,लेकिन यह भी उतना ही सच है जितना विवेकानंद का सच, जिस दिन हमने देश के युवाओं को किताबों के साथ साथ वेदों का ज्ञान देना अनिवार्य कर दिया उस दिन हर घर से एक विवेकानंद निकलेगा और तब भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नही रोक सकता। विवेकानंद बनने की एक उम्र होती है। जब रामकृष्ण परमहंस से मिलने पर स्वामी विवेकानंद ने उनसे सवाल किया कि क्या आपने भगवान को देखा है? तब परमहंस ने जिस विस्वास के साथ जवाब दिया कि, हां मैंने देखा है, मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं जितना कि तुम्हें देख सकता हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उन्हें तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं।रामकृष्ण परमहंस के ईश्वर के प्रति इस विस्वास ने ही नरेन्द्रनाथ दत्त को स्वामी विवेकानंद बनाया।और उन्होंने योग अभ्यास से अपने भीतर विद्ध्यमान ऊर्जा को एकत्रित कर चेतन में रहते हुए ईष्वरीय अवस्था को विकसित किया।और इसी ऊर्जा के साथ जब 1893 में शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में जब स्वामी विवेकानंद ने अपना भाषण ‘अमेरिका के भाईयों और बहनों’ के संबोधन से शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो तालियों की आवाज से गूंजता रहा।सही मायनों में उस दिन से भारत और भारतीय संस्कृति को दुनियाभर में पहचान मिली।

अपने अंदर विद्ध्यमान शक्तियों को एकत्रित करने के लिए आज पूरी दुनिया योग का अनुसरण कर रही है कई ज्ञानी तो इस खोज में लगे है कि योग आया कहा से ,वेद पुराण उठाकर देखे तो योग पद्धति भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है।आज जिस योग को पूरी दुनिया अपने दैनिक जीवन मे अपना रही है अगर उस योग की उत्तपत्ति की बात करे तो , उसकी उत्तपत्ति भगवान शिव के द्वारा की गयी थी। वेद पुराण और वैज्ञानिक तथ्य भी यही बताते हैं की योग ही शिव है शिव ही योग तभी तो, शिवजी हमेशा योग मुद्रा में ही मन की स्मृतियों में वास करते है। शिव को योगी भी तो कहा जाता है। तभी तो बड़े बड़े ऋषियों ने शिव जी का वर्णन योग मुद्रा में ही किया है।युगों पहले योगिक परंपरा के मुताबिक शिव के निवास स्थान हिमालय क्षेत्र में योगिक प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी जहाँ पर आदि योगियों ने सप्तऋषियों के साथ जीवन-तंत्र की खोज करनी शुरू की जिसे आज हम योग कहते हैं। मानवता के इतिहास में पहली बार योग ने इस संभावना को खोजा और जाना कि किस तरह आप अपनी पूरी चेतना में रहकर अपनी वर्तमान अवस्था में भी योग के माध्यम से आप दूसरी अवस्था में विकसित हो सकते हैं। जिसका उदाहरण स्वामी विवेकानंद है। स्वामी विवेकानंद ने इस रहस्य से पर्दा उठाया और मानव जाति को बताया कि आपका जो वर्तमान शरीर का ढांचा है, यह जीवन की सीमा नहीं है। बल्कि आप योग के जरिये इस ढांचे को पार कर सत्य के करीब पहुँच सकते है योग के माध्यम से मनुष्य शरीर के भीतर निहित अपनी शक्तियों को जाग्रत कर कठिन से कठिन कार्य कर सकता है।स्वामी जी का मानना था कि स्वस्थ मस्तिक के साथ एक स्वस्थ शरीर का होना अति आवश्यक है। तभी मनुष्य कर्मयोग की पराकाष्ठा को पार कर राजयोग की प्राप्ति कर सकता है।

जिसको मोक्ष से जोड़कर भी देखा गया,जो जन्म मृत्य से परे है। देवताओं द्वारा मानव जाति के उद्धार और ज्ञान के प्रकाश के लिए सप्तऋषियों को भेजा गया।योगिक कथाओं में कई तरह से इसका वर्णन है।कहते है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की तो देखा कि उनकी रचना जीवन के बाद नश्वर है ,जिसको हर बार नए सिरे से सृजन करना पड़ेगा।ब्रम्हा जी को समझ नही आ रहा था कि क्या करे।जब कोई उपाय नही सुझा तो वह देवो के देव महादेव के पास गए जो योग मुद्रा में लीन थे।शिव को योग मुद्रा से जगाने के लिए ब्रम्हा ने शिव जी की कठोर तपस्या की तब शिव जी ने प्रसन्न होकर ब्रम्हा जी की समस्या का समाधान योग के द्वारा किया।जिसमें शिव अपनी वर्तमान अवस्था से परे जाकर पुरुष और प्रकृति की दूसरी अवस्था मे प्रकट हुए जिसको हम अर्द्धनारीश्वर कहते है।जिसमे आधे भाग में पुरुष और आधे भाग में प्रकति, है जो प्रजननशील है, और जीवन की सृजनकर्ता है। शिव शक्ति का यह रूप सृष्टि की रचना में स्त्री और पुरुष के महत्व का भी ज्ञान कराता है।जब कोई योगी अपनी वर्तमान अवस्था के शरीर को पार कर योग की चरम सीमा में पहुँचता है तो वह शिव हो जाता है और शिव ही सत्य,शिव का अर्द्धनारीश्वर रूप पुरुष और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित कर सृष्टि को संचालित करता है, पुरुष और प्रकृति में यदि संतुलन न हो तो सृष्टि की कल्पना भी नही की जा सकती,शिव ने सृष्टि रचना के लिए योग माया द्वारा ही अपनी शक्ति को स्वंय से पृथक किया जो स्त्री लिंग है।(शिव) पुरुष लिंग का प्रतीक है वही (शक्ति) स्त्री लिंग प्रतीक होने के कारण ही शिव पुरुष भी है और स्त्री भी,तभी तो शिव अर्द्धनारीश्वर कहलाये।

विवेकानंद जी को बचपन से ही वेद वेदांत भगवत पुराण, गीता,का ज्ञान मिला उन्होंने अपने जीवन में उस ज्ञान को अपनाया घण्टो एकांत में योग साधना करते और ऊर्जा एकत्रित करते जिसके पास ऊर्जा का भंडार और वेदों का ज्ञान हो वह पूजनीय स्थान प्राप्त करता है।उस ज्ञान प्राप्ति के बाद बाहरी ज्ञान की आवश्यकता ही नही।वेदों में जो योग क्रिया से अपनी ऊर्जा को एकत्रित करने का ज्ञान है उस ऊर्जा को शिव के तीसरे नेत्र से जोड़कर देखा जाता है। क्योकि शिवजी को त्रिनेत्रधारी के नाम से भी जाना जाता है।त्रिदेवों में शिवजी ही है जिनके मस्तक पर तीसरा नेत्र है जिसमे तमोगुण का वास है ।शिवजी से जुड़े कई रहस्य है जो आज भी देखने को मिल जाते है।हम बात कर रहे है उनके तीसरे नेत्र उनकी ऊर्जा की जिनका जिक्र शिव पुराण में मिलता है।शिवजी की तीसरी आंख को प्रलय कहा जाता है,कहते है शिव जी के तीसरे नेत्र से निकलने वाली ऊर्जा सृष्टि को भस्म कर सकती है,शिवजी के एक नेत्र में चंद्रमा दूसरे नेत्र में सूर्य का वास है।जिसमे दाएं नेत्र में सत्वगुण और बाएं नेत्र में रजोगुण और तीसरे नेत्र में तमोगुण का वास है। तीसरे नेत्र को विवेक भी माना गया है क्योंकि तीसरा नेत्र शिवजी का आज्ञाचक्र जो विवेक बुद्धि का स्रोत है।जो योग के द्वारा ही जाग्रत किया जा सकता है। एक सामान्य जीव योग क्रिया द्वारा उस तीसरे नेत्र को विवेक बुद्धि के स्रोत पर ध्यान केंद्रित कर आज्ञाचक्र के माध्यम से अपनी वर्तमान अवस्था मे रहते हुए दूसरी अवस्था मे विकसित हो सकता है।यही त्रिनेत्र है जो ऊर्जावान है,जो प्रलय है योग द्वारा उस आंख से वह सबकुछ देख सकते है जो ब्रम्हांड में घटित होने वाला है, और जो हो चुका है।जो आम आंखों से नही देखा जा सकता वह योग अभ्यास द्वारा एकत्रित ऊर्जा से दोनों भौहों के मध्य विराजित आज्ञाचक्र जो योग द्वारा खुलने वाले विवेक बुद्धि का तीसरा नेत्र खुल जाने पर अपने वर्तमान चेतन में रहते हुए एक सामान्य मनुष्य शिव तत्व को प्राप्त होता है।यही योग है।स्वामी विवेकानंद ने योग के जरिये अपनी इंद्रियों और शरीर को वश में करके अपने अंदर की ऊर्जा को एकत्रित कर अपने आज्ञाचक्र को जाग्रत कर शिव तत्व को प्राप्त किया तभी नरेन्द्रनाथ से स्वामी विवेकानंद कहलाये।

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