
हाईकोर्ट ने मप्र मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, राज्य सरकार व अन्य से छह सप्ताह में जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता समाजसेवी और एक्टिविस्ट किशोर कोडवानी ने जनहित याचिका में हाई कोर्ट के समक्ष सबसे बड़ा दावा किया है कि मेट्रो लाइन अंडरग्राउंड कहां से कहां तक रहेगी, ये अभी तक तय ही नहीं है।
जमीन पर स्टेशन बनाने और मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण कहां-कहां होगा ये किसी को पता नहीं है। वर्षों से रह रहे रहवासी, दुकानदार और प्लॉट मालिक अधिग्रहण की बात से पूरी तरह बेखबर हैं। उन्हें दावे-आपत्ति लगाने का मौका भी नहीं मिला।
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय से भी जरूरी अनुमतियां नहीं ली गई। सुनवाई के दौरान कोडवानी ने कहा कि जब तक सरकार जवाब पेश करेगी, तब तक इस प्रोजेक्ट पर रोक लगाई जाए।
दायर याचिका में कोडवानी कहा कि इंदौर में फेस-2 के मेट्रो प्रोजेक्ट को रीगल से एयरपोर्ट तक बनना बताया है। इस रूट पर एक दर्जन से ज्यादा ऐतिहासिक इमारतें आ रही हैं। अंडरग्राउंड काम किए जाने पर खुदाई की जाएगी, ब्लास्ट किए जाएंगे।
बीच शहर में तमाम व्यवसायिक प्रतिष्ठान, मल्टी, मार्केट भी हैं, इनकी नींव को भारी नुकसान पहुंचेगा। अन्य शहरों में जहां मेट्रो को अंडरग्राउंड किया गया था, वहां भी इस तरह की शिकायत आई है। मेट्रो के ट्रैक पर जो बाजार और बिल्डिंग हैं, वह 50 से लेकर 100 साल से भी अधिक पुरानी हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि ऐतिहासिक स्मारक अधिनियम के मुताबिक ऐतिहासिक धरोहर की बाउंड्री से 100 मीटर परिधि में एक फीट से ज्यादा गहरा नहीं खोद सकते। केवल खेती कर सकते हैं। सौ मीटर से अगले दो सौ मीटर तक किसी भी तरह का निर्माण और खनन प्रतिबंधित है। जबकि मेट्रो रुट पर 32 धरोहर स्थित हैं। ये ऐसी इमारतें हैं जो सौ साल से ज्यादा पुरानी हैं, इनमें से कुछ हेरिटेज के तहत भी आती है। इन बिल्डिंग के लिए हेरिटेज अधिनियम में प्रावधान है कि उल्लंघन करने पर जेल व जुर्माने या दोनों हो सकता है।
इंदौर के पूर्वी क्षेत्र में देव गुराडिया पहाड़ी समुद्र तल से 650 मीटर ऊंचाई है जबकि भानगढ़ 555 मीटर। अंडर ग्राउंड मेट्रो 80 फीट नीचे बनाई जाना है। ऐसे में जमीन के नीचे मौजूद पत्थर को काटकर टनल बनाई जाएगी। इससे प्राकृतिक जल संरचनाएं पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाएंगी। इस वजह से ऊंची सतह से निचली सतह पर जाने वाली सैकड़ों वर्षों पुरानी जल संरचनाएं अपना रास्ता बदल देंगी। दावा यह भी है कि ऐसी स्थिति बनने पर कई जगह बोरिंग ओवर फ्लो होगा तो कई जगह बोरिंग सूख जाएंगे।
याचिका में पानी को लेकर चिंता जताते हुए कहा गया है कि नर्मदा से पानी सप्लाय होने के बाद भी इंदौर की लगभग आधी आबादी खुद के जल स्रोत पर निर्भर है। इंदौर पहले ही पानी के मामले में डार्क जोन में जा चुका है, ऐसे में इंदौर के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्से तक पानी पहुंचने में दिक्कतें आएंगी। क्योंकि पश्चिम-उत्तर से पूर्वी इंदौर की ऊंचाई अधिक है।

