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कंस्ट्रक्शन श्रमिकों को मिलेगा उनके ही हक का पैसा, जिसे दबाए बैठी थीं सरकारें!

नई दिल्ली.

Abhishek Raghuvanshi30 मार्च 2020 · 1 मिनट पढ़ें
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस संकट (Covid-19) से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन (Coronavirus Lockdown) में दिल्ली, यूपी और हरियाणा जैसी कुछ राज्य सरकारों ने दिहाड़ी और कंस्ट्रक्शन श्रमिकों को उनके जीवनयापन के लिए जो आर्थिक मदद देने का एलान किया है दरअसल वो उन्हीं श्रमिकों के हक का पैसा है. जिस पर वर्षों से तमाम राज्यों की सरकारें कुंडली मारे बैठी हुई थीं. श्रमिकों को मिलने वाली यह सहायता कोई भी सरकार अपने पास से नहीं दे रही. बिल्डिंग और दूसरे कंस्ट्रक्शन वर्कर्स के लिए काटे गए सेस का 52,000 करोड़ रुपया अनयूज्ड पड़ा हुआ है. जिसके खर्च न होने पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट भी नाराजगी जाहिर कर चुका है.

ऐसे श्रमिकों के लिए लड़ाई लड़ने वाले एक्टिविस्ट एसए आजाद कहते हैं कि अब संकट की इस घड़ी में इसी पैसे को देने का एलान करके कई दिनों से कुछ राज्य सरकारें श्रमिकों पर जैसे एहसान सा लाद रही हैं. कोई भी निर्माण जिस पर 10 लाख रुपये से अधिक की लागत आती है उसे कुल लागत की एक फीसदी रकम बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्क्स एक्ट के तहत जमा करनी होती है. जिसे 18 स्कीमों के जरिए कंस्ट्रक्शन श्रमिकों के कल्याण के लिए खर्च करना होता है.

तस्वीरों में खबर2 फोटो
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कंस्ट्रक्शन वर्करों के कल्याण के लिए काटे गए सेस का 52 हजार करोड़ रुपया पड़ा हुआ है (प्रतीकात्मक फोटो)

राज्य सरकारों पर सवालआजाद कहते हैं कि दुर्भाग्य से कोई भी राज्य सरकार न तो सभी कंस्ट्रक्शन श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन करती है और न ही जो रजिस्टर्ड हो गए उन्हें लाभ ही देती है. इसीलिए इतना पैसा इस स्कीम में पड़ा हुआ था. ये मजदूर सिर्फ इमारतों का नहीं बल्कि देश का भी निर्माण करते हैं. फिर भी तमाम राज्य इनका हक मारने से परहेज नहीं करते. दो साल पहले नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक (CAG) ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा सौंपा था जिसमें कहा गया था कि इस राशि का इस्तेमाल लैपटॉप और वॉशिंग मशीन खरीदने में किया जा रहा था.

किस राज्य में कितने कंस्ट्रक्शन वर्कर

कंस्ट्रक्शन श्रमिकों के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय श्रम मंत्रालय की ओर से इसी साल 3 फरवरी को लोकसभा में जो आंकड़ा दिया गया है उसके मुताबिक देश भर में 3 करोड़ 92 लाख 17 हजार 369 भवन निर्माण श्रमिक रजिस्टर्ड हैं. इसमें सबसे अधिक 56.70 लाख यूपी में हैं. दिल्ली में 5,48,769 और हरियाणा में 8,58,980 रजिस्ट्रेशन है. यूपी ने प्रति श्रमिक 1000 रुपये, दिल्ली सरकार ने 5000 और हरियाणा सरकार ने 4500 रुपये देने का फैसला किया है.

केंद्र ने फंड खर्च करने को कहा

केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेश के उप राज्यपालों को पत्र लिखकर एक एडवाइजरी जारी कर लेबर वेलफेयर सेस के जरिए जुटाए गए पैसों से कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में लगे ऐसे सभी मजदूरों की मदद करने को कहा था. क्योंकि कोरोना वायरस से पैदा हुए संकट का सबसे ज्यादा नुकसान असंगठित क्षेत्र के उन मजदूरों को उठाना पड़ा है जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं.

किस एक्ट के तहत एकत्र होता है पैसा

बिल्डिंग और दूसरे कंस्ट्रक्शन वर्कर सबसे ज्यादा असुरक्षित होते हैं. उनका काम भी अस्थायी और काम के घंटे काफी लंबे होते हैं. इसलिए उनके हितों को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार ने बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर एक्ट 1996 (BOCW-Building and Other Construction Workers act) बनाया था. इसके तहत सभी राज्यों में बीओसीडब्ल्यू वेलफेयर बोर्ड बनाए गए हैं. ये सेस इसी पर वसूला जाता है.

कंस्ट्रक्शन श्रमिकों के हक का पैसा न खर्च करने पर सुप्रीम कोर्ट भी लगा चुका है फटकार

कौन-कौन हैं हकदार

इस एक्ट में भवन तथा अन्य निर्माण श्रमिकों के रोजगार तथा सेवा शर्तों के साथ ही उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याणकारी उपायों के प्रावधान हैं. इसके तहत राज मिस्त्री, ईंट पकाने वाले मजदूर, प्लंबर, वैल्डर, इलेक्ट्रिशियन, सीवरेज, मार्बल, टाइल लगाने वाले और पेंटर-पीओपी करने वाले आदि शामिल हैं. सभी राज्यों को मिलाकर इस सेस से 52000 करोड़ रुपये उपलब्ध हैं.

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