
खुफिया विभाग में पदस्थ दो महिला अफसरों के मध्य चल रहा द्वंद्व पुलिस मुख्यालय तक पहुंच गया है। वर्चस्व की इस लड़ाई में निचला स्टाफ पिस रहा है। दबदबा कायम रखने के लिए एक मुद्दे पर दो बार बैठकें होती हैं। इस मामले की पुलिस मुख्यालय (भोपाल) में चर्चा हो रही है। अबोलापन एडीसीपी और एसीपी स्तर के अफसर में है। एडीसीपी की मुख्यालय से पोस्टिंग हुई है। पुलिस लाइन में पदस्थ एसीपी को आयुक्त मकरंद देऊस्कर ने मौखिक आदेश से बैठाया है। विदेशी पंजीयन, आर्म्स लाइसेंस, कालोनी सेल, बिल्डर लाइसेंस, फायर एनओसी जैसे प्रमुख काम एसीपी के जिम्मे ही हैं। आसूचना से संबंधित कामों को लेकर होने वाले दैनिक कार्यों में भी तनातनी होती है। जिन मुद्दों को लेकर एडीसीपी बैठक लेकर निर्देश देती हैं एसीपी भी उन्हीं मुद्दों पर बैठक बुला लेती है।
निर्वाचित विधायकों के आगे-पीछे घूम रहे अफसर
शहर में पदस्थ अफसर असमंजस की स्थिति में हैं। चुनाव पूर्व के जमे समीकरण बिगड़ चुके हैं। नए सिरे से जमावट करनी पड़ रही है। लिहाजा निर्वाचित विधायकों के आगे-पीछे घूमना पड़ रहा है। ज्यादातर टीआइ-एसीपी और एडीसीपी चुनाव पूर्व ही आए हैं। अनुमान था कि इस बार कांग्रेस की सरकार बन रही है। लिहाजा भाजपा नेताओं से ज्यादा ताल्लुक नहीं रखा। चुनाव के दौरान भी व्यवहार में रूखापन रहा। जैसे ही नौ विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक चुने, हवाइयां उड़ गई। रातोंरात संपर्कों को खंगालना शुरू कर दिया। कुछ अफसर ऐसे भी थे जो भाजपा नेताओं की पसंद हैं जो निर्वाचित विधायकों के धुर विरोधी हैं। ऐसे में विधायक क्षेत्र से हटाने की सिफारिश न करे इसके लिए परेशान होना पड़ रहा है। कुछेक ने तो उन वरिष्ठ भाजपा नेताओं का दामन थाम लिया जो प्रदेश में दखलअंदाजी रखते हैं।
