
तीन माह की दुधमुंही बच्ची की हत्या करने वाले माता-पिता को जिला न्यायालय इंदौर ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बच्ची का जन्म से ही एक कान नहीं था। हत्यारे पिता ने उसे इस तरह से संडासी मारी कि बच्ची ने दम तोड़ दिया।
मां ने भी बेटी के पक्ष में खड़े रहने के बजाय पति का साथ दिया और हत्या के बाद बच्ची के शव को कचरे के ढेर पर फेंक आई। प्रकरण में अभियोजन के सारे गवाह पक्षद्रोही हो गए थे, लेकिन न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य को देखते हुए आरोपित मां-बाप को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि हत्यारों ने मां-बाप होते हुए एक मासूम की हत्या की है। उनके साथ किसी तरह की रियायत नहीं बरती जा सकती।
कचरे के ढेर में मिला था शव
वारदात करीब सात वर्ष पुरानी है। 16 मार्च 2016 को पुलिस को सूचना मिली थी कि खजराना क्षेत्र के नोबल पब्लिक स्कूल के पास कचरे के ढेर में एक बालिका का शव गोदड़ी में लिपटा पड़ा है। पुलिस ने मर्ग कायम किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवाया। पोस्टमार्टम में पता चला कि शिशु की मृत्यु सिर में चोट आने की वजह से हुई थी। पुलिस ने धारा 302, 201 में प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू की।
बच्ची का एक कान नहीं था
गवाहों के बयान से यह बात साफ हुई कि यह बच्ची खजराना क्षेत्र में ही रहने वाले पप्पू पुत्र सोमवार रावल और उसकी पत्नी संगीताबाई की है। बच्ची का जन्म से ही एक कान नहीं था। इसी वजह से नाराज पिता पप्पू ने उसके सिर पर लोहे की संडासी से मारा था। चोट लगने से उसकी मौत हो गई। संगीता ने बच्ची की मौत के बाद शव को कचरे के ढेर पर फेंक दिया था। पकड़े जाने पर आरोपितों ने स्वीकारा था कि कचरे के ढेर पर मिला शव उन्हीं की बेटी का है।
दूसरी बेटी नहीं चाहता था पिता
एडीपीओ अविसारिका जैन ने बताया कि हत्यारे दंपती की पहले से एक बच्ची है। हत्यारा पिता पप्पू दूसरी बच्ची नहीं चाहता था। जन्म से ही इस बच्ची का एक कान नहीं था। इस वजह से भी वह इस बच्ची से पीछा छुड़ाना चाहता था। मजदूरी करने वाले पप्पू को जैसे ही मौका मिला उसने बच्ची की हत्या कर दी।
डीएनए टेस्ट में माता-पिता होने की पुष्टि
बच्ची की फीमर बोन और आरोपित माता-पिता के रक्त के नमूने डीएनए जांच के लिए भेजे गए थे। इसमें आरोपितों के बच्ची के माता-पिता होने की पुष्टि हुई थी। संपूर्ण विवेचना के बाद मामले में चालान पेश किया गया।
परिस्थितिजन्य सबूत के आधार पर कोर्ट ने सुनाई सजा
अभियोजन ने जितने भी स्वतंत्र साक्षियों के बयान कोर्ट में करवाए वे सभी पक्षद्रोही हो गए थे। बावजूद इसके न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को विश्वसनीय मानते हुए सजा सुनाई। कोर्ट ने माना कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन ने मामले को युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित किया है।

