
अपराध शाखा के डीसीपी निमिष अग्रवाल का डर तो है। डीसीपी की अनुमति बगैर पत्ता भी नहीं हिलता। एडीसीपी-एसीपी और निरीक्षक होने के बाद भी न आवेदन लिए गए न कायमी की फाइल आगे बढ़ी। एक साल पूर्व इंदौर आए डीसीपी की ईमानदार अफसरों में गिनती होती है। पिछले महीने शासन ने उन्हें प्रशिक्षण पर हैदराबाद भेज दिया। शुभ-लाभ के मामलों में बदनाम क्राइम ब्रांच में खुशी की लहर दौड़ गई। एसआइ-एएसआइ ने तय कर लिया कि अब लंबित मामलों को निपटा लिया जाएगा। लेकिन उनके सपनों पर उस वक्त पानी फिर गया जब प्रभारी अफसरों ने अग्रवाल की वापसी तक नए मामलों में हाथ डालने से हाथ खींच लिए। तय किया कि डीसीपी के लौटने तक न तो कोई जांच रिपोर्ट बनेगी न नया प्रकरण दर्ज होगा। वरिष्ठ अफसरों ने तो महीनों से पड़ी तबादला सूची की तरफ झांका तक नहीं।
