बिहार चुनाव 2025: चिराग पासवान अब NDA में केवल एक सहयोगी नहीं, एक निर्णायक चेहरा बन गए हैं.
Chirag Paswan LJP : बिहार चुनाव में एनडीए की भारी जीत के बीच चिराग पासवान का प्रदर्शन एक नई राजनीतिक शक्ति संरचना को जन्म दे रहा है. अब सवाल यह है कि क्या चिराग बिहार की राजनीति में एक स्वतंत्र और स्थायी ‘केंद्र शक्ति’ बनेंगे? क्या एनडीए के भीतर उनकी भूमिका बढ़ेगी और क्या यह उभार भविष्य में 2030 के उस लक्ष्य की ओर उनका पहला कदम है, जिसके संकेत वह कई बार दे चुके हैं?
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में एनडीए की भारी और अपेक्षित जीत तो तय मानी जा रही थी, लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक आश्चर्य उस जगह से आया, जहां से शायद ही उम्मीद की गई थी.. यानि ‘पीएम मोदी के हनुमान’ चिराग पासवान और उनकी पार्टी लोजपा (रामविलास) से. एक ऐसी पार्टी, जो 2020 में केवल एक सीट ही निकाल सकी थी. वह इस बार 22 सीटों पर बढ़त लेकर बिहार की राजनीति की सबसे अप्रत्याशित सुर्खियों में छा गई है. चुनाव में उसका यह परफॉर्मेंस न सिर्फ चिराग की बिहार में राजनीतिक वापसी की कहानी है, बल्कि एनडीए के भीतर ‘शक्ति संतुलन’ को भी नए सिरे से परिभाषित करने वाली बन गई है. इस तरह एनडीए की जीत में चिराग पासवान अब केवल एक सहयोगी नहीं, एक निर्णायक चेहरा बन गए हैं. बिहार की राजनीति में उनका प्रभाव अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत दिख रहा है.
दरअसल, लोजपा (रामविलास) पिछले कुछ सालों में संगठनात्मक बिखराव, पारिवारिक दरार और चुनावी हार की वजह से राजनीतिक हाशिये पर चली गई थी. पर 2025 के नतीजे साफ बता रहे हैं कि चिराग पासवान की नेतृत्व शैली और उनकी राजनीतिक रणनीति ने पार्टी को एक नए उभार पर ला खड़ा किया है. एनडीए में शामिल होकर पार्टी ने अब तक का अपना सबसे मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है. यह बढ़त न केवल चिराग के लिए बड़ी उपलब्धि है, बल्कि पटना में सत्ता के समीकरणों को भी बदल रही है.
सीट बंटवारा जिसमें शक था, आज ‘मास्टरस्ट्रोक’ दिख रहा
एनडीए ने लोजपा (रामविलास) को 29 सीटें दी थीं, जिसे कई सहयोगियों ने ‘अनुपात से ज्यादा’ बताया था, लेकिन बिहार चुनाव के नतीजों ने इस कदम को एक सुनियोजित राजनीतिक दांव साबित कर दिया है. चिराग पासवान इस चुनाव के प्रमुख विजेताओं में गिने जा रहे हैं और एनडीए के भीतर उनकी भूमिका और भी अहम होने वाली है. कुल मिलाकर 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए 200 सीटों पर आगे है, जिसमें चिराग की सीटें एक निर्णायक बढ़त का हिस्सा हैं.
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2020 से 2025, यानि हार से उभार तक की तेज राजनीतिक यात्रा
बात अगर 2020 की करें तो इस दौरान अकेली लड़ाई में उनकी पार्टी ने केवल 1 सीट जीती थी. पिछले चुनाव में चिराग ने अकेले 137 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. इस दौरान उनका मुख्य नैरेटिव नीतीश कुमार की आलोचना था. चिराग भले खुद नहीं जीते, लेकिन उनके उम्मीदवारों ने जेडीयू को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था, जिससे जदयू 71 से गिरकर 43 सीटों पर आ गई थी. इस बार चिराग न तो किसी को नुकसान पहुंचा रहे हैं, न ही विपक्ष की रणनीति को बिगाड़ रहे हैं. बल्कि वह एनडीए के प्रमुख स्तंभ बनकर उभरे हैं. एक ऐसा सहयोगी, जिसे अब कोई हल्के में नहीं ले सकता.
2020 के बाद पार्टी दो हिस्सों में यानि चिराग और उनके चाचा पशुपति पारस के नेतृत्व में बंट गई थी, लेकिन धीरे-धीरे चिराग ने अपनी पकड़ फिर से मजबूत की. 2024 लोकसभा में पार्टी ने दमदार NDA में वापसी की. इसमें एक संसदीय सीट वह जीतीं और मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में मंत्रिमंडल में भी आई. इन सबने चिराग की राजनीतिक साख और विश्वसनीयता को फिर से स्थापित किया.
चिराग ने प्रचार के दौरान नीतीश कुमार पर पुराने आरोप दोहराने से परहेज किया. उन्होंने खुद कहा कि 2020 में मेरी कोई समस्या भाजपा या प्रधानमंत्री मोदी से नहीं थी, सिर्फ नीतीश से थी. लेकिन इस बार उन्होंने यह टकराव पीछे छोड़ दिया और गठबंधन की एकजुटता पर ध्यान दिया. इस बदलाव ने मतदाताओं को भी नया संदेश दिया.
कहां-कहां चमकी एलजेपी
चिराग की पार्टी ने उत्तर, मध्य और दक्षिण बिहार में मजबूत उपस्थिति दिखाकर सभी अनुमानों को गलत साबित कर दिया. वह सीटों पर आगे रही है. सुगौली, गोविंदगंज, बेलसंड, बहादुरगंज, कसबा, बलरामपुर, सिमरी बख्तियारपुर, बोचहां, दरौली, महुआ, बखरी, परबत्ता, नाथनगर, बख्तियारपुर, फतुहा, बृह्मपुर, छेनारी, देहरी, ओबरा, शेरघाटी, रजौली, गोबिंदपुर. इन क्षेत्रों में चिराग की पार्टी का उभार इस बात की ओर इशारा करती है कि उनकी अपील जाति आधारित सीमाओं से आगे निकलकर विकास की राजनीति के तौर पर आगे बढ़ रही है.
