डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी-
वरिष्ठ पत्रकार श्री कीर्ति राणा की कलमगिरी
कीर्ति राणा जी 40 से अधिक वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने पत्रकारिता में केबिन में बैठकर ज्ञान बघारने का काम नहीं किया, बल्कि वे फील्ड में पत्रकारिता करते रहे. उनकी पत्रकारिता का स्टाइल राजेंद्र माथुर साहब या प्रभाष जोशी जी की तरह की पत्रकारिता नहीं थी, बल्कि सुरेंद्र प्रताप सिंह, गोपी कृष्ण गुप्ता, शशीद्र जलधारी और महेंद्र बापना के तरीके की रही है. फील्ड में.
आज उनकी जिस किताब का विमोचन हो रहा है, उसमें कई लोगों से अंतरंग संबंधों और प्रोफेशनल घटनाक्रम का जिक्र है, माननीय श्रवण गर्ग साहब, पंडित विजय शंकर मेहता साहब, सुधीर अग्रवाल जी, एन के सिंह साहब, गोकुल शर्मा जी, रमेश अग्रवाल साहब, कल्पेश याग्निक जी और राजकुमार केसवानी जी के किस्से भी इसमें शामिल है. इसके अलावा और भी कई विषय है जो आपके हृदय के तारों को झनझना सकते हैं.
इस किताब में कीर्ति राणा ने बताया है कि कैसे महेंद्र बापना की रिपोर्टिंग की स्टाइल उनकी अपनी स्टाइल बन गई, कैसे उन्होंने संपादक रहते हुए श्री सिंथेटिक्स के मजदूरों की लड़ाई लड़ी, कैसे उन्होंने संपादक के रूप में अपने हर एडिशन को सजाया. वे जिस शहर में रहे उसी शहर के रहे और उस शहर का नमक अदा किया. चाहे वह इंदौर हो, मुंबई हो, उज्जैन हो, उदयपुर हो, श्रीगंगानगर हो या शिमला हो. वे हमेशा एक मैदानी पत्रकार ही रहे.
बाबा महाकाल की उन पर खास कृपा बनी रही. उन्होंने सभी धर्माचार्य का सानिध्य प्राप्त किया. कई सिंहस्थ कवर किये. हिंदू धर्माचार्य के अलावा बोहरा धर्मगुरु बुरहानुद्दीन साहब का भी आशीष उन्हें मिल चुका है.
एक रिपोर्टर के रूप में उन्होंने अखबार की हर तरह की खबरें कवर की. उनकी विशिष्ट रिपोर्टिंग में एक फांसी की लाइव रिपोर्टिंग भी शामिल है, जिस पर महत्वपूर्ण लघु फ़िल्म बनी थी. इस फ़िल्म में उनकी भी भूमिका थी. एक संपादक के रूप में उन्होंने अपने अखबार की विश्वसनीय बढ़ाई, जो दुष्कर्म कार्य है. उन्होंने अखबार को अलग-अलग समाज में पहुंचाया.
कीर्ति राणा जी की खूबी रही कि उन्होंने कभी भी प्रबंधन के गुस्से का शिकार अपने मातहत साथियों को नहीं बनाया. न ही कवही उनको ढाल की तरह इस्तेमाल किया, बल्कि वह खुद उनके लिए ढाल बनकर रहे.
इस किताब में उनके मनमोहन किससे हैं, उनके संघर्ष ए किस्से उनकी लड़ाई और जीत ए किस्से भी हैं. हार्दिक शुभकामनाएं कीर्ति जी, आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और इसी तरह जीवंत पत्रकारिता करते रहे!
