
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसके अनुसार अब नगर निगम सीमा में पेड़ काटने की अनुमति निगमायुक्त के बजाय वृक्ष अधिकारी देंगे। यह फैसला पर्यावरण सुरक्षा और पेड़ों की कटाई पर नियंत्रण रखने के लिए आया है।
पर्यावरण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम, पेड़ों की कटाई पर नियंत्रण।
सरकार को दो सप्ताह में वृक्ष अधिकारी की नियुक्ति करने का निर्देश।
जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दिया है महत्वपूर्ण आदेश।
इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि अब भविष्य में नगर निगम सीमा में पेड़ काटने की अनुमति निगमायुक्त नहीं, बल्कि वृक्ष अधिकारी देंगे। सरकार को दो सप्ताह के भीतर वृक्ष अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। इस बारे में शासन को हाई कोर्ट में चार सप्ताह में रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने यह आदेश उस जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है, जिसमें कहा है कि मध्य प्रदेश वृक्ष परिरक्षण अधिनियम-2000 की धारा चार के तहत निगमायुक्त ही वृक्ष अधिकारी होते हैं।
ऐसे मिलती थी पेड़ काटने की अनुमति
इंदौर में नगर निगम विकास कार्य भी करता है। ऐसी स्थिति में वृक्ष अधिकारी बगैर किसी सोच-विचार के विकास कार्य के नाम पर वर्षों पुराने और बड़े पेड़ों को धड़ल्ले से काटने की अनुमति दे रहे हैं। 100 रुपये के आवेदन शुल्क और 500 रुपये का मुआवजा शुल्क भरकर नगर निगम से अनुमति प्राप्त कर ली जाती है।
विकास के नाम पर पेड़ों को काटा गया
एक तरफ तो निगमायुक्त के पास पेड़ों की अवैध कटाई होने पर जुर्माना लगाने का अधिकार है और दूसरी तरफ वे ही पेड़ों की कटाई की अनुमति देने के लिए अधिकृत हैं। याचिकाकर्ता डॉ. अमन शर्मा की ओर से बताया गया कि इंदौर के मल्हाराश्रम और एमओजी लाइंस में विकास के नाम पर निगम ने कई पेड़ों को काट दिया है।
निगमायुक्त ने ही पेड़ काटने की अनुमति दी थी। इस पर हाई कोर्ट ने मल्हाराश्रम और एमओजी लाइंस में पेड़ काटने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए सरकार से कहा है कि वह दो सप्ताह के भीतर वृक्ष अधिकारी की नियुक्ति करे।
अब भविष्य में निगमायुक्त नहीं, बल्कि वृक्ष अधिकारी ही पेड़ काटने की अनुमति देंगे। मंगलवार को हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने शासन को वृक्ष अधिकारी नियुक्त करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
