उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासन इनकी बिक्री रोकने के पुख्ता इंतजाम कर चुका होगा ताकि बाद में उसे लाठी पीटने की आवश्यकता न पड़े।
हमारी व्यवस्था में प्रशासन और पुलिस की तैयारी अकसर घटना के बाद की होती है। जैसे दूषित भोजन से बीमार होने के बाद कार्रवाई या फिर हादसा होने पर रोकथाम के उपायों का आडिट। ऐसा ही एक मामला चीनी मांझे की बिक्री का है। मकर संक्रांति नजदीक है। उत्साही लोग पतंग और मांझे की व्यवस्था में जुटे हैं। चीनी मांझों की वजह से बीते वर्षों में कई हादसे हो चुके हैं। उज्जैन में तो एक छात्रा की गर्दन कट गई और उसकी मौत हो गई थी। बाकी दुर्घटनाओं की संख्या तो अनगिनत है। ऐसे दर्दनाक हादसे प्रशासन को सतर्क करने के लिए काफी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रशासन इनकी बिक्री रोकने के पुख्ता इंतजाम कर चुका होगा ताकि बाद में उसे लाठी पीटने की आवश्यकता न पड़े। अब तक तो प्रशासन को इनके विक्रेताओं के ठिकानों की जांच कर लेनी चाहिए थी।
कुछ तो है जो अफसरी मिटती नहीं इनकी
प्रशासनिक अधिकारी अकसर आपा खोते रहते हैं। एक तो अफसर बनने के बाद उनके डीएनए में सर्वश्रेष्ठ होने का भ्रम शामिल हो जाता है। इसके बाद अपने अधीनस्थों से इतना कथित सम्मान मिलता है कि यह भ्रम टूटता ही नहीं। वैसे भी प्रशासनिक अधिकारियों का जनता से सीधा संवाद खत्म होता जा रहा है। जब आदत नहीं रहेगी तो गड़बड़ी होने की गुंजाइश बढ़ भी जाएगी। यह अलग बात है कि राज्य सरकार की ओर से बार-बार कहा जाता है कि अधिकारी गांवों में जाएं, लोगों से मिलें, समस्याओं को समझें। शाजापुर के हटाए गए कलेक्टर किशोर कन्याल इसका ताजा उदाहरण बन गए हैं। बात यह भी है कि औपचारिक बैठकों में मीडिया के कैमरे होते नहीं और डांट खाने वाले उनसे अधिकार और पद में छोटे होते हैं इसलिए सामने से सवाल की आदत भी नहीं होती। ऐसा बहुत कुछ है इसीलिए अफसरी हटने का नाम नहीं लेती।
