- संज्ञेय और असंज्ञेय दो तरह के अपराध होते हैं। संज्ञेय अपराध से आशय है ऐसा अपराध जिसमें पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए वारंट की जरूरत नहीं होती। असंज्ञेय अपराध पुलिस द्वारा अहस्तक्षेप योग्य होते हैं।
- संज्ञेय अपराध अजमानतीय होते हैं।
- ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर आरोपित को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना होता है।
- असंज्ञेय अपराध पुलिस द्वारा अहस्तक्षेप योग्य होते हैं।
इंदौर। संज्ञेय और असंज्ञेय दो तरह के अपराध होते हैं। संज्ञेय अपराध से आशय है ऐसा अपराध जिसमें पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए वारंट की जरूरत नहीं होती। ये अपराध गंभीर और संगीन किस्म के होते हैं। अभियुक्त कहीं भाग न जाए और अपराध से जुड़े साक्ष्य नष्ट न कर दे इसलिए ऐसे मामलों में बगैर किसी वारंट के आरोपित को गिरफ्तार कर जांच शुरू कर दी जाती है। संज्ञेय अपराध अजमानतीय होते हैं।एडवोकेट वरुण रावल ने बताया कि संज्ञेय अपराधों में हत्या, हत्या का प्रयास, लूट, डकैती, दुष्कर्म, देशद्रोह जैसे गंभीर मामले शामिल हैं। पुलिस ने अगर किसी व्यक्ति को संज्ञेय अपराध में गिरफ्तार किया है तो पुलिस को उसे गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देनी होती है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर आरोपित को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करना होता है।
असंज्ञेय अपराध में एफआइआर नहीं
दूसरी तरह के अपराध असंज्ञेय अपराध होते हैं। ये अपराध पुलिस द्वारा अहस्तक्षेप योग्य होते हैं। असंज्ञेय अपराध के मामले में पुलिस कोई एफआइआर दर्ज नहीं करती बल्कि फरियादी द्वारा बताई गई घटना को लेखबद्ध करके इसकी एक कापी उसे दे देती है। इस तरह के मामलों में पुलिस कार्रवाई करने के बजाय फरियादी को समझाइश देती है कि यह अपराध असंज्ञेय है और
पुलिस इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
बावजूद इसके अगर फरियादी आरोपित के खिलाफ कार्रवाई चाहता है तो उसे संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होता है। उसे परिवाद के साथ पुलिस द्वारा दी गई अदम चेक रिपोर्ट भी प्रस्तुत करना चाहिए। परिवाद प्रस्तुत होने पर न्यायालय प्राथमिक साक्ष्य लेकर आरोपित के खिलाफ अपराध का संज्ञान ले सकता है। अपराध के संज्ञान पश्चात न्यायालय आरोपित को समंस जारी करता है। आरोपित को न्यायालय में उपस्थित होकर जमानत की कार्रवाई करना पड़ती है।
अधिवक्ता की होती है जरूरत
असंज्ञेय अपराध मजिस्ट्रेट न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए फरियादी को अधिवक्ता की आवश्यकता होती है। अगर परिवादी निर्धन है तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उसे निश्शुल्क अधिवक्ता और न्याय शुल्क में छूट दे सकता है। हालांकि इसके लिए आवेदन करना होता है। चेक अनादरण (चेक बाउंस) के मामले भी असंज्ञेय अपराध होते हैं। यही वजह है कि इन मामलों में
पुलिस एफआइआर दर्ज नहीं करती है।
व्यक्ति को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट के प्रविधानों के तहत परिवाद प्रस्तुत करना होता है। अगर आपको ऐसा लगता है कि किसी मामले को पुलिस जानबूझकर असंज्ञेय बताकर एफआइआर दर्ज करने से बच रही है या आरोपित को फायदा पहुंचाने का प्रयास कर रही है तो आप आरोपित के विरुद्ध निजी परिवाद दायर कर सकते हैं। परिवाद दायर कर आप पुलिस को न्यायालय के माध्यम से आरोपित के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने के आदेश करवा सकते हैं।
