केदारनाथ- केदाराचल पर जो गमन करके प्राण त्याग करनें से मनुष्य शिव लोक को प्राप्त होता हैं । जो मनुष्य सन्यास लेकर केदार में निवास करता है । वह शिव के समान हो जाता है । केदार क्षैत्र में निवास करनें से तथा डीन्डी नामक रूद्र का पूजन करनें से मनुष्य अनायास ही स्वर्ग को जाता हैं ।
केदारनाथ केदारपुरी में जानें की इच्छा मात्र से मनुष्य की 300 पीढियों तक के पितृ शिव लोक में चलें जातें हैं । केदार क्षैत्र सभी क्षेत्रों में उत्तम हैं । केदार शिवजी की दक्षिण दिशा में रेतस कुण्ड है। इसका जल पीने मात्र से मनुष्य शिवरूप हो जाता है । इससे उत्तर में स्फटिक लिंग है। जिसके पूर्व सात पद पर बछि तीर्थ में बर्फ के बीच में तप्त जल हैं इसी स्थान पर भीमसेन ने मुन्काओ से श्री शंकर जी की पूजा की थीं इसके आगे महापथ हैं, वहां जानें से मनुष्य आवागमन से छूट जाता हैं।
शिव के प्रिय पांच क्षेत्र
श्री पंच केदार
पद्मपुराणान्तर्गत दिए वर्णनानुसार शिव जी के पांच क्षेत्र हैं:-
1 केदारनाथ
2 मध्य महेश्वर
3 तुन्डंनाथ
4 रुद्रनाथ
5 कल्पेश्वर महादेव
केदारनाथ, मध्यमहेश्वर , तुन्डंनाथ, कल्पेश्वर, और महालय रुद्रनाथ के यहाँ यह पांच माह स्थान है, जो मनुष्य भक्ति भाव से ग्यान से अग्यान से इन क्षेत्रों में जाते हैं यह इस लोक मे सुन्दर भोगो को भोग कर अन्त में मोक्ष पाते हैं और दर्शन मात्र से ही पापी मनुष्य भी मोक्ष और पवित्रता पाते हैं ।
श्री केदारनाथ जी की कथा प्राचीन काल से चली आ रही है । हिमालय शिव को सदा हीं प्रिय रहा है । जिस प्रकार से केदार घाटी अपनी मनोरमा छटा बिखेरतीं है ठीक उसी प्रकार से यह केदारनाथ केदार खण्ड क्षेत्र अपनें अंदर कई आख्यानों को समेटे हुए आस्था और विश्वास का केन्द्र बना हुआ हैं ।
ये कब बना? कैसे बना? किसने बनाया? इससे कुछ मतभेदों को भुला दे तों यहाँ की महत्ता द्वापर काल से हीं चली आ रही है । इसी घाटी में परमपिता शिव को पाण्डवों ने पहचान लिया था । दरअसल इस महादेव मंदिर की तरह इसकी कथा भी आपकों आश्चर्य चकित करनें वालीं हैं । कुल मिलाकर यहाँ की कथा इतिहास आध्यात्मिक, भौगोलिक एवं भौतिक विश्लेषण करनें के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यहां की स्थिति अनोखी हैं। आईये यहाँ की प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक- विश्लेषण से पहले इनकी पौराणिक कथा पर नजर डालते हैं । इस मंदिर की कहानी कहने से पहले आपको श्री केदारनाथ जी की कथा कहतें हैं ।
महाभारत युद्ध के बाद जब पाण्डव भगवान श्री कृष्ण से युद्ध में हुए पाप के निवारण का उपाय बताने को कहा तब उन्होंने कहा- हे वीर प्रतापी पाण्डव आपके द्वारा किये गये अक्षम पापों को सिर्फ भोलेनाथ महादेव हीं मिटाने में सक्षम हैं अतः आप लोगों को इससे मुक्ति हेतु शिव जी के पास जाना बहुत जरूरी है वासुदेव कृष्ण की आग्या से पान्चो भाई भोले की खोज में चल पडें। जब शंकर भगवान जी को इसकी जानकारी हुई तों वे काशी विश्वनाथ से निकलकर हिमालय की इन वादियों में आ गयें, जिन्हें केदार क्षेत्र या केदार खण्ड कहतें हैं ।
यहाँ भी जब पाण्डव भोले को ढूंढते हुए पहुंच गयें । तों अपनी पहचान छुपाने के लिए भोले बाबा ने वहां चर रहे भैसों के बीच में भैंसा बनकर चरने लगें । इतनें पर भी भक्त पाण्डवों की नजर से भगवान शिव शंकर जी नहीं बच सकें । शिव जी उनसे बच निकलने के लिए पहाडों के अंदर तेजी से घुसने लगें, तब महाबलशाली भीम ने उनके पृष्ठ भाग को अपनी विशाल भुजाओं में जकड़ लिया और पाण्डव त्राहि-त्राहि करके भोले नाथ की स्तुति करनें लगें ।
कहा जाता है कि उनका सिर पशुपतिनाथ जी नेपाल में निकला, मुख रुद्रनाथ में, भुजाएं तुन्गनाथ में, नाभि मदमहेश्वर में, और जटा कल्पेश्वर महादेव में निकला । ऐसा माना जाता है कि यहां पर पाण्डवों ने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया जो की कालान्तर में जीर्ण हो गये । जिसे बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने बनबाया, जिसका जीर्णोद्धार बाद में राजा भोज ने करवाया ।
