सत्तन को विधानसभा नहीं लोकसभा में होना चाहिए -अटल जी

By Abhishek Raghuvanshi
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श्रधेय अटल बिहारी वाजपेई जी ने गुरुजी के लिए यह शब्द कुछ सोच कर ही बोले होंगे. लेकिन सत्तनजी का कहना है कि में नेता बहुत बाद में हूं सबसे पहले कवि हूँ। मैं कहता हूं गुरुजी कवि तो है लेकिन वह तुलसी, कबीर, रसखान की बिरादरी के कवि है। समाज में जो हो रहा है जो दिख रहा है वही बोलते हैं।

उन्हें इस बात की कतई परवाह नहीं रहती है कि उनके “सत्य” से उनका “अहित” हो जाएगा।
वे कई बार कहते हैं मेरे माता-पिता ने मेरा नाम सत्यनारायण रखा है सत्य तो बोलूंगा ही….
उनके सत्य बाण के शिकार शहर के पार्षद विधायक, प्रदेश के दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री से लेकर कद्दावर राष्ट्रीय नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री तक भी है।

ये उनका ही साहस है कि वे तात्कालिक संगठन महामंत्री अरविंद मेनन को RK स्टूडियो का आदमी बोल दे।
ये उनका ही साहस है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को मंच से कह दे कि शिवराज जब तुमने दिया तब भी मैं तुमसे मांगने नहीं गया था और अब भी तुमसे मांगने नहीं आऊंगा ..मांगन गए सो मर गए, मरे जो मांगन जाए। उनका ही साहस है कि वह प्रदेश के प्रभारी मुरली राव के अनुचित बयान पर कविता लिख सके।

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