क्या होती है वर्चुअल रैली? नई तकनीक से इसमें कैसे होता है कमाल?

By Abhishek Raghuvanshi
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आबादी के लिहाज़ से सबसे बड़े लोकतंत्र (Democracy) भारत में चुनावी अभियान की बात हो तो रैली अहम होती है. रैली के ज़रिये बड़े जनसमूह के दिलो-दिमाग को प्रभावित किया जा सकता है. लेकिन, Coronavirus के दौर में चूंकि भीड़ जुटने से संक्रमण का खतरा है इसलिए अब राजनीतिक पार्टियां डिजिटल या वर्चुअल रैली (Virtual Rally) का रुख कर रही हैं. फेसबुक लाइव (FB Live), Youtube और Zoom मीटिंग्स जैसे सोशल मीडिया इस्तेमाल के आगे की बात है वर्चुअल रैली.

इस तरह की रैली में रियल टाइम इवेंट के तहत न केवल आयोजन किया जा रहा है बल्कि कुछ ब्रांड और कंपनियां प्लानिंग और टाइमलाइन ट्रैकिंग जैसी सेवाएं भी दे रही हैं. इसमें वीडियो के साथ ही आप ग्राफिक, पोल अन्य जानकारियों का शुमार कर सकते हैं. कुछ कंपनियां रैली के बाद वर्चुअल रैली में हाज़िरी, गतिविधियों और मेल आदि से जुड़े आंकड़े और डेटा भी मुहैया करवा रही हैं. अब जानना ज़रूरी है कि ये रैलियां कैसे होती हैं और इसमें तकनीक के क्या पहलू हैं.

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बिहार जन संवाद शीर्षक से अमित शाह ने वर्चुअल रैली के ज़रिये भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित किया.

अमित शाह की रैली से सुर्खियों में है वर्चुअल रैली
देश के गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के आगामी चुनावों के सिलसिले में बड़े पैमाने पर वर्चुअल रैली की, जिससे वह करीब 5 लाख कार्यकर्ताओं तक पहुंचे. इसके बाद से ही चुनावी रैलियों के डिजिटल होने को लेकर चर्चा छिड़ी हुई है. सवाल यह है कि भारत में मीडिया और इंटरनेट का जाल कितना बड़ा है और राजनीति के डिजिटलीकरण से कौन सी आबादी चुनावी अभियानों से जुड़ पाएगी और कौन सी नहीं? अस्ल में, भारत में एक तरफ ​डिजिटल क्रांति भी है तो दूसरी तरफ, गरीबी, अशिक्षा के साथ ही दूरस्थ इलाकों तक कई सुविधाओं की पहुंच नहीं है.

अब आएगी वर्चुअल रैलियों की बाढ़
बिहार में हालिया वर्चुअल रैली के बाद अमित शाह ओडिशा में ऐसी ही रैली करने वाले हैं. इसके बाद भाजपा पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों के मद्देनज़र राज्य में करीब 1000 ऐसी ही रैलियां करेगी. दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस और बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों ने भी ​वर्चुअल रैलियों के बारे में रणनीति बनाना शुरू कर दी है. भाजपा सहित अन्य कुछ राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि अगर कोविड महामारी संबंधी संक्रमण के हालात ऐसे ही रहे तो वास्तविक रैलियां हो पाना मुश्किल ही होगा.

अब तक बेहद प्रचलित रही हैं रैलियां
खबरों में बताए गए आंकड़ों के मुताबिक 2014 के चुनावों के सिलसिले में नरेंद्र मोदी ने भाजपा अभियान के तहत 437 बड़ी रैलियां की थीं और कुल 5827 जन समारोहों में शिरकत की थी. वहीं, 2019 चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी से ज़्यादा रैलियां की थीं. इन रैलियों में हज़ारों लोग वास्तविक रूप से जुटते रहे और टीवी पर लाखों करोड़ों लोगों तक नेताओं की पहुंच रही. अब वर्चुअल रैलियों की सीमाओं और तकनीकों के बारे में जानते हैं.

अब डिजिटल ही होगा मंत्र
कोविड 19 के इलाज को लेकर क्या भविष्य होगा, इस पर निर्भर होगा कि रैलियों का भविष्य क्या होगा. फिर भी डिजिटलीकरण की तरफ आक्रामक रुख तो शुरू हो ही चुका है और यह और बढ़ने वाला है. राजनीतिक पार्टियों की डिजिटल विंग्स लगातार नई ​तकनीकों और विचारों के हिसाब से रणनीतियां बना रही हैं. सोशल मीडिया पर न केवल बेतहाशा खर्च किया जा रहा है बल्कि डेटा विश्लेषण पर विमर्श हो रहा है. वहीं, पार्टियां अपने ग्रामीण कार्यकर्ताओं तक को ​टेक सैवी बनाने की कोशिश कर रही हैं.

शाह की वर्चुअल रैली को भाजपा ने चुनावी रैली मानने से इनकार किया.

वर्चुअल रैलियों की सीमाएं
राजनीतिक पार्टियां निकट भविष्य में अलग थीम और विचार पर आधारित वर्चुअल रैलियों पर फोकस कर सकती हैं. यह भी कहा जा रहा है कि इन रैलियों को टीवी पर भी प्रसारित किए जाने की योजनाएं हो सकती हैं. दूसरी तरफ, इनकी सीमाओं के बारे में स्पष्ट है कि पहले तो ये रैलियां अभी तक एकतरफा संवाद हैं और दूसरी तरफ, बहुत खर्चीली साबित हो रही हैं. कैसे? उदाहरण से जानें.

अमित शाह की ​बिहार में हालिया वर्चुअल रैली की कीमत कितनी रही? राज्य के 72 हज़ार बूथों के कार्यकर्ताओं तक शाह का संवाद पहुंचाने के लिए हज़ारों की संख्या में एलईडी स्क्रीनों और स्मार्ट टीवी इंस्टॉल कराए गए. आरजेडी ने आरोप लगाया कि इस रैली पर सरकार ने 144 करोड़ रुपए खर्च किए.

माध्यमों का इस्तेमाल चतुराई से
टीवी के साथ ही रेडियो के राष्ट्रीय चैनलों का इस्तेमाल सत्ताधारी पार्टी के हाथ में रहेगा और निजी चैनलों या रेडियो एफएम के ज़रिये अन्य पार्टियां वर्चुअल कैंपेनिंग कर सकती हैं. चूंकि अभी ​वर्चुअल रैली का खर्च बहुत ज़्यादा होगा इसलिए संचार माध्यमों के चतुराई भरे इस्तेमाल से बाज़ी जीती जाएगी. स्मार्टफोन के ज़रिये पार्टियां करोड़ों लोगों तक पहुंचने की रणनीति बना सकती हैं. वॉट्सएप सहित मैसेंजर, वीडियो कॉल और मीटिंग एप्स का प्रयोग किया जा सकता है.

शाह की वर्चुअल रैली के बाद ट्विटर व सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है.

नई तकनीकें तय करेंगी भविष्य
स्मार्ट फोन, सोशल मीडिया और प्रचलित माध्यमों से वर्चुअल रैलियों और चुनावी अभियानों की शुरूआत होने के बाद यह बाज़ार बढ़ेगा और नई तकनीकें या आइडिया आएंगे. कई तकनीकी कंपनियां राजनीतिक पार्टियों के लिए विशेष रूप से इनोवेटिव तकनीकें या मंच तैयार करेंगी. अभी ज़ूम क्लाउड जैसी तकनीकों से वीडियो मीटिंग या संवाद प्रचलित हो रहे हैं लेकिन रैलियों के लिए और बेहतर मंच जुटाने की ज़रूरत बनी हुई है ताकि रैलियों का खर्च कम हो सके और इनमें जीवंतता महसूस हो सके.

हालांकि यह है कि भारत में डिजिटल पहुंच को समय के साथ बढ़ाना ही वर्चुअल चुनावी अभियानों का भविष्य तय करेगा. क्योंकि अभी तो यह प्रयोग बड़े तौर पर सिर्फ शहरी वोटरों तक की पहुंच में ही होगा. बहरहाल, राजनीतिक पार्टियों का डिजिटलीकरण आने वाले दिनों में एक बेहतरीन कहानी तो बनने जा रहा है, यह तय है.

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