इंदौर। पीथमपुर की सैकड़ों फैक्ट्रियों में काम करने वाले लाखों मज़दूरों की जान किसके भरोसे है? इस सवाल का जवाब खोजते-खोजते मीडिया एक ऐसे नाम तक पहुँची, जो खुद को “मुख्यमंत्री का खास” बताता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में मज़दूरों की मौत का सौदागर बन बैठा है।
नाम है राजेश जाटव, लेकिन कागज़ों में खुद को छुपाकर राजेश यादव लिखता है। यही शख्स बीते पांच सालों से पीथमपुर की इंडस्ट्रियल बेल्ट पर एकछत्र राज कर रहा है – बतौर फैक्ट्री इंस्पेक्टर। नाम बदलकर कैसे सिस्टम को धोखा दिया जा सकता है, इसकी मिसाल है राजेश।
“10 हज़ार दे दो और लाश हटाओ!” – कर्मचारियों की मौत पर सौदेबाज़ी
सूत्रों के मुताबिक, जब किसी फैक्ट्री में मज़दूर की जान जाती है, तो राजेश फैक्ट्री प्रबंधन से मिलकर उस मौत को “दुर्घटना” में बदल देता है। फिर मृतक के परिवार को चुप रहने के लिए थमा दिए जाते हैं सिर्फ 10 से 20 हज़ार रुपये, और कागज़ों में सब कुछ क्लीन चिट फायर सेफ्टी और मज़दूरों की सुरक्षा का मज़ाक हमारी पड़ताल में सामने आया कि कई फैक्ट्रियों में न फायर सेफ्टी है, न सेफ्टी इक्विपमेंट्स, और पेट्रोल-डीज़ल खुले में रखा जाता है। ये सब जानते हुए भी फैक्ट्री इंस्पेक्टर राजेश न कोई चालान करता है, न कोई निरीक्षण। क्यों? क्योंकि “सेटिंग” की मोटी रकम हर महीने जेब में जाती है।

