
सायरन, धमाके और गोलीबारी की आवाजें दिल दहला रही हैं। मुझे नहीं पता कि बाहर क्या मंजर है। आंखों के सामने अंधेरा है और कानों में बस यही आवाजें आ रही हैं। मैं दो दिन से हॉस्टल में ही हूं, जिसे एक तरह का बंकर बनाया गया है। कमरों की रोशनी बंद है। बाहर दिन का उजाला होने के बाद भी हम अंधेरे में बैठे हैं। सर, मैंने कई बार दूतावास में कॉल की, लेकिन कोई जवाब ही नहीं मिला। मेरी घर पर बात भी नहीं हो पाई है।
हमारे पास खाना पर्याप्त है, लेकिन नकदी ज्यादा नहीं है। इतना कहते ही रोहिणी के सेक्टर-18 निवासी प्रिया नागपाल फफक पड़ीं। उन्होंने कहा कि सर, मुझे यहां से वापस आना है। मेरे दोस्तों को भी यहां से जाना है। हम पीएम मोदी और उनकी पूरी सरकार से हाथ जोड़कर विनती करते हैं। हमें सुरक्षित अपने घर पहुंचा दीजिए सर। बृहस्पतिवार को ‘अमर उजाला’ से बातचीत में प्रिया कुछ और जानकारी दे पातीं कि उससे पहले ही उनका फोन बंद हो गया।
इसी बीच यूक्रेन की राजधानी कीव से 500 किलोमीटर दूर एक मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस द्वितीय वर्ष के छात्र विभु डबास ने फोन पर बताया कि वे पूरी तरह से सुरक्षित हैं। दूतावास के निर्देशों के अनुसार उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया है। मदनपुर डबास निवासी विभु ने बताया कि उनकी परिजनों से बातचीत हुई है। इंटरनेट उनके यहां चल रहा है लेकिन प्रिया नागपाल की तरह विभु भी अपने कमरे में बैठे दिल दहला देने वाली आवाजें सुन रहे हैं।
वहीं करोल बाग निवासी विवेक सचदेवा ने फोन पर बताया कि वे रिश्तेदार के साथ हैं। दो साल पहले वे खरकीव यूनिवर्सिटी आए थे लेकिन पिछले कुछ दिन से तनाव बढ़ने से उन्होंने कीव छोड़ दिया है। रास्ते में काफी जाम होने की वजह से वे 12 घंटे से फंसे हुए हैं। विवेक ने कहा कि उनके फोन में इंटरनेट नहीं चल रहा है। उनके रिश्तेदार और वे सुरक्षित जगह की तलाश कर रहे हैं।
10 दिन पहले बुक कराई टिकट, आखिरी वक्त में एयरपोर्ट सील
नजफगढ़ निवासी संजय कुमार ने बताया कि उनकी बेटी सिमरन सहगल एक वर्ष पहले यूक्रेन गई थी। पुलतावा यूनिवर्सिटी से वह एमबीबीएस कर रही है। यूक्रेन में तनाव के चलते उन्होंने 10 दिन पहले बिटिया को वापस बुलाने के लिए टिकट भी बुक करा दिया था। 25 फरवरी को सिमरन भारत आने के लिए फ्लाइट लेने वाली थी लेकिन उससे पहले बृहस्पतिवार को ही सभी एयरपोर्ट सील कर दिए गए। संजय ने बताया कि सिमरन हॉस्टल में ही है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि वे जल्द से जल्द सभी बच्चों को वापस लाने का प्रयास करे।
आखिरी वक्त तक चलीं कक्षाएं, इसलिए फंसे छात्र
खरकीव नेशनल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस कर रहे लक्ष्मी नगर निवासी विकास वर्मा ने बताया कि वे तृतीय वर्ष के छात्र हैं। आखिरी वक्त यानी 23 फरवरी तक उनके यहां क्लासेज चल रही थीं। यूक्रेन और भारतीय मीडिया में तनाव की खबरें चल रही थीं लेकिन कॉलेज की गतिविधियों को देख इस पर भरोसा नहीं हो रहा था, इसलिए उनके साथ-साथ बाकी भारतीय छात्रों ने भी वापस जाने का नहीं सोचा। आखिरी वक्त तक क्लासेज चलने की वजह से उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला। विकास का कहना है कि सरकार को तत्काल उन्हें एयरलिफ्ट कराना चाहिए।
मेडिकल हब है यूक्रेन, साल में सात से आठ लाख का खर्च
चिकित्सीय शिक्षा को लेकर यूक्रेन काफी समय से हब बना हुआ है। भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों से छात्र-छात्राएं यहां आकर पढ़ाई करते हैं और फिर वापस अपने देश जाकर चिकित्सीय प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। नजफगढ़ निवासी संजय कुमार ने बताया कि सालाना तीन से पांच लाख फीस और हॉस्टल खर्च को मिलाकर करीब सात से आठ लाख रुपये का खर्च पड़ता है।
दोपहर में पकड़नी थी फ्लाइट, रेलवे स्टेशन भी बंद
छात्रों ने फोन पर बताया कि उन्हें कीव से बृहस्पतिवार दोपहर दो बजे दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी, इसके लिए उन्होंने करीब छह से सात घंटे का बस सफर भी किया, लेकिन एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद पता चला कि सभी फ्लाइट को रोक दिया गया है। इसी तरह रेलवे स्टेशन पर पहुंचने के बाद पता चला कि वहां भी सब कुछ बंद है।
सोशल मीडिया का मिला सहारा, फिर दूतावास से आया संदेश
छात्रों ने बताया कि कीव एयरपोर्ट बंद होने के बाद जब वापस शहर में भारतीय दूतावास पहुंचे तो पीछे की ओर धुआं दिखाई दे रहा था। सुबह कड़ाके की ठंड के बीच काफी देर तक दूतावास के बाहर खड़े होने के बाद भी उन्हें मदद नहीं मिली। सोशल मीडिया से पता चला कि दूतावास बंद हो गया। इसके बाद छात्रों ने सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करना शुरू किया जिसके कुछ घंटे बाद दूतावास से उन्हें पता चला कि अभी फिलहाल के लिए सब सुरक्षित जगहों पर पहुंच जाएं। सरकार जल्द ही उन्हें एयरलिफ्ट कराने के लिए संपर्क करेगी। इसके बाद से कोई संपर्क नहीं हुआ है।
दूतावास ने नहीं दिया समय, टिकट की वेटिंग, 1.50 लाख किराया
यूक्रेन के अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे दिल्ली के छात्रों ने बताया कि दूतावास की ओर से उन्हें अधिक समय नहीं दिया गया। तीन दिन पहले ही उन्हें बताया गया कि जो घर वापस जाना चाहता है वह जा सकता है। इस संदेश के बाद स्थिति यह हुई कि ऑनलाइन टिकट मिलना भी महंगा पड़ गया। लंबी वेटिंग शुरू हुई और फिर दिल्ली आने का किराया भी 1.50 लाख रुपये पार चला गया जो 10 दिन पहले 35 हजार रुपये के आसपास था, इसीलिए ज्यादातर छात्र समय पर टिकट बुक नहीं कर पाए। सोशल मीडिया पर इन्होंने वीडियो अपलोड करते हुए यह कहानी बयां की।
दिल्ली में यूक्रेन दूतावास पर पहुंचे परिजन
बृहस्पतिवार को एक ओर यूक्रेन में सैन्य हमले की खबरें आना शुरू हुईं तो वहीं दूसरी ओर नई दिल्ली स्थित यूक्रेन दूतावास पर भारतीय छात्रों के परिजन पहुंचने लगे। यहां पश्चिम विहार से अपने भाई की सूचना लेने के लिए पहुंचीं नेहा लांबा ने बताया कि उनका भाई एमबीबीएस का छात्र है। वे सुबह से उसे फोन कर रही हैं लेकिन बात नहीं हो पा रही है। सुबह से वहां की तस्वीरें टीवी पर जो दिखाई दे रही हैं उसे देख दिल बैठा जा रहा है।
इसी बीच पूजा नागपाल भी अपने भतीजे की जानकारी लेने पहुंचीं। पूजा ने बताया कि पिछले साल ओमिक्रॉन आने से पहले ही उनका भतीजा प्रिंस यूक्रेन गया था। उसे वहां पुलतावा मेडिकल यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिला है लेकिन तीन दिन से उसकी परिवार में बात नहीं हुई है। नेहा और पूजा की तरह और भी कई परिवार दूतावास के बाहर खड़े रहे लेकिन आधे घंटे बाद दूतावास के अधिकारियों ने छात्रों के बारे में जानकारी दी और उनकी वीडियो कॉल पर बात भी कराई।

