
Republic Day 2022 : देश की आजादी के लिए शहीद Bhagat Singh महज 23 वर्ष की उम्र में भगत सिंह हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए थे।
: नई दिल्ली। पूरा देश 73वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। अंग्रेजों की 200 वर्ष की गुलामी के बाद भारत ने 15 अगस्त ( 15 August 1947 ) 1947 को आजादी का स्वाद चखा। ये आजादी इतनी आसान नहीं थी। इसके पीछे था उन वीर सपूतों का योगदान जिन्होंने हंसते-हंसते देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। ऐसे ही वीर सपूतों में से एक नाम है शहीद भगत सिंह
देश में जब भी आजादी का जिक्र होगा शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम खुद ब खुद सामने आ जाएगा। आजादी के इस परवाने ने ना सिर्फ अपने प्राणों का बलिदान दिया बल्कि देश के लाखों युवाओं में आजादी का वो जज्बा पैदा किया जो अब भी नौजवानों की रगों में दौड़ता है।
ऐसा था भगत सिंह का जीवन
28 सितम्बर 1907 को देश में एक वीर का जन्म हुआ, जिसका नाम था भगत सिंह। उस समय उनके चाचा अजीत सिंह और श्वान सिंह भारत की आजादी में अपना सहयोग दे रहे थे। ये दोनों करतार सिंह सराभा द्वारा संचालित गदर पाटी के सदस्य थे। भगत सिंह पर इन दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा था। इसलिए ये बचपन से ही अंग्रेजों से घृणा करने लगे थे।
13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला।
लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में भगत सिंह महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन में भाग लेने लगे, जिसमें गांधी जी विदेशी समानों का बहिष्कार कर रहे थे।
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महज चौदह वर्ष की उम्र में भगत सिंह ने स्कूल की किताबें और कपड़े जला दिए थे। 1921 में महात्मा गांधी ने चौरा चौरा हत्याकांड में जब किसानों का साथ नहीं दिया तो इस घटना का भगत सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा।
भगत सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। 9 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसेंजर से काकोरी नामक छोटे से स्टेशन पर सरकारी खजाने को लूट लिया।
भगत सिंह ने अपने देश की आजादी के लिए कई योगदान दिए हैं। यहां तक की उन्होंने शादी के लिए मना करते हुए यह कह दिया कि ‘अगर आजादी से पहले मैं शादी करूंगा तो मेरी दुल्हन मौत होगी।’
वो भगत सिंह ही थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलना कबूल कर लिया था लेकिन अंग्रेजों की शर्तों को मानना मंजूर नहीं था।
भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर इन्होंने देश की आजादी के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया।
वर्ष 1926 में नौजवान भारत सभा भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया गया। इसके बाद सन् 1928 में उन्होने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को ज्वाइन किया। ये चन्द्रशेखर आजाद ने बनाया था और पूरी पार्टी ने जुट कर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आए साइमन कमीशन का विरोध किया।
इस विरोध में लाला लाजपत राय भी शामिल थे। लेकिन अंग्रेजों की लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय की मृत्य हो गई और इसने भगत सिंह को हिला कर रख दिया।
भगत सिंह ने ठान लिया कि अंग्रेजों को इसका जवाब देना होगा। 8 अप्रैल 1929 को उन्होंने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की अस्सेम्बली में बम विस्फोट कर दिया।
इस विस्फोट का मकसद लोगों तक आजादी की लड़ाई के लिए आवाज पहुंचाना था। इस विस्फोट के बाद भगत सिंह को जेल हो गई। यहां से भी उन्होंने आजादी के लिए लड़ाई छोड़ी नहीं बल्कि और तेज कर दी। अखबारों के जरिए भगत लगातार अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखते रहे।
उन्होंने 23 वर्ष की छोटी-सी आयु में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का विषद अध्ययन किया था।
हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिश भाषा के मर्मज्ञ चिंतक और विचारक भगतसिंह भारत में समाजवाद के पहले व्याख्याता थे। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फांसी दे दी गई। फांसी पर जाने से पहले वे ‘बिस्मिल’ की जीवनी पढ़ रहे थे।

