MP-MLA कोर्ट का बड़ा फैसला: पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े सहित 8 आरोपियों को बरी किया

By Abhishek Raghuvanshi
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2020 के बड़ौद थाने के शासकीय कार्य में बाधा मामले में फैसला; कोर्ट बोली- धक्का-मुक्की के सबूत नहीं, महत्वपूर्ण सीसीटीवी फुटेज भी पेश नहीं की गई

इंदौर। इंदौर की विशेष सांसद-विधायक (MP-MLA) कोर्ट ने वर्ष 2020 में आगर-मालवा के बड़ौद थाने में शासकीय कार्य में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों को धमकाने के मामले में पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े सहित आठ आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया। फैसले में अदालत ने पुलिस जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पुलिस अधिकारियों से बहस या वाद-विवाद करना अपने आप में शासकीय कार्य में बाधा डालने का अपराध नहीं माना जा सकता। 

मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता आशीष एस. शर्मा ने पुलिस की जांच और साक्ष्यों को लेकर कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अभियोजन की कहानी पर संदेह व्यक्त किया और सभी आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।

2020 में दर्ज हुआ था मामला

प्रकरण 23 नवंबर 2020 का है। तत्कालीन थाना प्रभारी ने बड़ौद थाने में दर्ज कराई शिकायत में आरोप लगाया था कि उस समय विधायक रहे विपिन वानखेड़े अपने समर्थकों के साथ थाने पहुंचे और पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए शासकीय कार्य में बाधा डाली। पुलिस ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने थाना परिसर में हंगामा किया, पुलिसकर्मियों से अभद्र व्यवहार किया और उन्हें धमकाया। इस मामले में पूर्व विधायक सहित आठ लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया था।

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कोर्ट बोली- केवल तर्क-वितर्क अपराध नहीं

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि किसी जनप्रतिनिधि या नागरिक का पुलिस अधिकारी से किसी मुद्दे पर मौखिक बहस या तर्क-वितर्क करना मात्र इस आधार पर अपराध नहीं बन जाता। यदि शासकीय कार्य में बाधा डालने या लोक सेवक पर हमला करने का आरोप लगाया जाता है, तो यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी ने आपराधिक बल का प्रयोग किया हो या ऐसा कोई कृत्य किया हो, जिससे सरकारी काम बाधित हुआ हो। केवल कहासुनी या विरोध दर्ज कराने को भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

सीसीटीवी में नहीं मिला धक्का-मुक्की का प्रमाण

अदालत ने घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज का भी परीक्षण किया। आदेश में उल्लेख किया गया कि उपलब्ध फुटेज में कहीं भी यह दिखाई नहीं देता कि आरोपियों ने थाना प्रभारी या अन्य पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की, हाथापाई या बल प्रयोग किया हो। ऐसे में अभियोजन का यह आरोप साक्ष्यों से पुष्ट नहीं हो सका।

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