कहा, “हमला मेरे शरीर पर हुआ, विचारों पर नहीं; संघ से मिला आत्मविश्वास और आत्मीयता मुझे हर विपरीत परिस्थिति में खड़ा रखती रही
19 लोगों का रक्त मेरी देह में दौड़ता है – सदानंदन जी
- कन्नूर की राजनीतिक हिंसा से लेकर राज्यसभा तक की यात्रा सुनाते हुए बोले सदानंदन, बाधाएं तूफान बनकर आएं, आदर्श की ज्योति कभी नहीं बुझ सकती!
- हार्दिक दवे के साथ संवाद में खुला जीवन का दूसरा पक्ष, वामपंथ से वैचारिक दूरी, कृत्रिम पैरों के साथ जीवन, अवसाद, युवाओं की चुनौतियां और राष्ट्रबोध पर बेबाक बातचीत
“मेरे दोनों पैर काट दिए गए, लेकिन मेरे विचारों की दिशा नहीं काटी जा सकी। मेरा शरीर घायल हुआ, मेरा संकल्प नहीं।”
प्रख्यात शिक्षाविद्, चिंतक एवं राज्यसभा सांसद सी. सदानंदन मास्टर ने इंदौर में अपने जीवन की उस त्रासदी को याद करते हुए यह बात कही, जिसने उनकी जिंदगी को दो हिस्सों, हमले से पहले और हमले के बाद, में बांट दिया। उन्होंने कहा कि 1994 में कन्नूर में राजनीतिक हिंसा का शिकार होने के बाद लंबे उपचार और कृत्रिम पैरों के सहारे उन्होंने जीवन को फिर खड़ा किया, लेकिन संघ से मिले आत्मविश्वास, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के स्नेह और समाज के सहयोग ने उन्हें कभी निराशा अथवा असहायता के भाव में नहीं जाने दिया।
संस्था ‘सार्थक’ द्वारा आयोजित प्रेरक व्याख्यान में “संघर्ष से संसद तक : वैचारिक प्रतिबद्धता” विषय पर बोलते हुए सदानंदन मास्टर ने अपने जीवन के संघर्ष, कन्नूर की राजनीतिक परिस्थितियों, वैचारिक यात्रा, संघ से जुड़ाव और राज्यसभा तक पहुंचने के अनुभवों को साझा किया। आयोजन में उनके संबोधन के बाद एंकर हार्दिक दवे ने उनसे संवाद किया, जिसमें उनके जीवन के उन पहलुओं पर भी सवाल हुए, जो सामान्यतः किसी सार्वजनिक परिचर्चा का हिस्सा नहीं बनते।
कन्नूर के रक्तरंजित दौर को याद किया!
सदानंदन मास्टर ने कन्नूर के दशकों पुराने राजनीतिक संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लंबे समय तक राजनीतिक हिंसा और हत्याओं की घटनाएं होती रहीं। उनके अनुसार, मार्क्सवादी राजनीति के मजबूत प्रभाव वाले इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार के साथ वैचारिक टकराव बढ़ा। उन्होंने कहा कि संघ ने समाज के लोगों के साथ आत्मीय संबंध, निरंतर संपर्क और संवाद के माध्यम से अपनी गतिविधियां बढ़ाईं और बड़ी संख्या में युवा उससे जुड़े।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि इसके बाद अनेक स्वयंसेवकों और उनके परिवारों को हिंसा, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक कठिनाइयों और अन्य प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इन घटनाओं को अपने अनुभव और उस दौर की परिस्थितियों के संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए कहा कि “केवल एक श्रेष्ठ आदर्श को अपनाने के कारण जब किसी पर लगातार हमले होते हैं, तो कभी-कभी वह आत्मरक्षा के लिए मजबूर हो जाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि संघ से जुड़े संगठनों के संयमित रुख, राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध जनजागरण और सामाजिक दबाव ने परिस्थितियों में बदलाव लाने में भूमिका निभाई।
“तीस वर्ष की उम्र में दोनों पैर काट दिए गए”
अपने जीवन के सबसे पीड़ादायक अध्याय को याद करते हुए सदानंदन मास्टर ने बताया कि 25 जनवरी 1994 को, गणतंत्र दिवस से ठीक एक दिन पहले, यात्रा के दौरान उन्हें रास्ते में रोककर हमला किया गया और उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काट दिए गए।
उन्होंने कहा कि इसके बाद लंबे उपचार से गुजरना पड़ा और कृत्रिम पैर लगाए गए, लेकिन इसके बावजूद संघ का कार्य और समाजसेवा की गतिविधियां रुकी नहींं। उन्होंने कहा, “मेरा मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ। न निराशा ने मुझे प्रभावित किया और न असहायता की भावना ने। इसके पीछे संघ की कार्यपद्धति, शाखा के माध्यम से प्राप्त आत्मविश्वास, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का स्नेह और संघ परिवारों से मिलने वाला संरक्षण प्रमुख आधार रहे।” उन्होंने कहा कि “बाधाएं भले ही तूफान बनकर आएं, स्वयंसेवक के भीतर जलने वाली आदर्श की ज्योति कभी बुझ नहीं सकती।”
वामपंथी परिवार से संघ तक की वैचारिक यात्रा
एंकर हार्दिक दवे ने संवाद में उनके जीवन के उस पक्ष को सामने रखा, जब वे स्वयं वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे और उनका पारिवारिक परिवेश भी वामपंथी राजनीति के निकट था। सवाल यह था कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने उन्हें उस विचारधारा से अलग होकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और आगे चलकर संघ की ओर जाने के लिए प्रेरित किया?
सदानंदन मास्टर ने अपनी वैचारिक यात्रा को जीवन के अनुभवों से जोड़ते हुए बताया कि विचार केवल पढ़ने-सुनने से नहीं बनते, बल्कि जीवन के अनुभव उन्हें आकार देते हैं। उन्होंने कहा कि संघ से जुड़ने के बाद उनके भीतर राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के संबंध को देखने की दृष्टि में व्यापक परिवर्तन आया।
वे शिक्षा के क्षेत्र से आए और शिक्षक के रूप में लंबे समय तक कार्य किया। उनके व्यक्तित्व में शिक्षक की संवेदना और संगठनात्मक कार्यकर्ता की अनुशासनबद्धता का समन्वय उनके सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण विशेषता रहा।
“मास्टर” सिर्फ नाम नहीं, मेरी पहचान है!
हार्दिक दवे ने पूछा कि उनके नाम के साथ जुड़ा “मास्टर” केवल संबोधन है या उनके जीवन की पहचान भी।
इस पर बातचीत शिक्षा से उनके गहरे संबंध की ओर चली गई। सदानंदन मास्टर ने अपने शिक्षक जीवन और विद्यार्थियों के साथ लंबे जुड़ाव को याद किया। शिक्षक के रूप में उनका अनुभव उनके सार्वजनिक जीवन में भी दिखाई देता है, जहां वे केवल विचार रखने के बजाय व्यक्ति निर्माण और युवा पीढ़ी के संस्कार पर विशेष बल देते हैं।
“राज्यसभा का दायित्व मेरे लिए अप्रत्याशित था”
राज्यसभा के लिए अपने मनोनयन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह दायित्व उनके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था। उनके अनुसार, तत्कालीन समय में प्रधानमंत्री जी द्वारा फोन पर उन्हें इसकी जानकारी दी गई और उन्होंने इसे एक दायित्व के रूप में विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया।
उन्होंने कहा कि उनके लिए संसद की सदस्यता व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन असंख्य कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के संघर्ष और बलिदान का सम्मान है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने कहा कि संसद सदस्य के रूप में उनका प्रयास उन सभी के सपनों को साकार करने की दिशा में रहेगा और इसके लिए उन्हें समाज के नैतिक समर्थन की आवश्यकता है।
व्यक्तिगत त्रासदी से आगे देखना होगा व्यक्ति को
हार्दिक दवे ने संवाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया, क्या किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसके साथ हुई त्रासदी बन जाने से वह उससे कभी पूरी तरह बाहर निकल पाता है? क्या “पीड़ित” या “उत्तरजीवी” जैसे शब्द व्यक्ति की पहचान को सीमित कर देते हैं?
इस सवाल ने बातचीत को सदानंदन मास्टर के व्यक्तित्व के दूसरे आयामों तक पहुंचाया। उनके जीवन की सबसे चर्चित घटना उनके दोनों पैर खोने की त्रासदी है, लेकिन उनका संदेश यही रहा कि किसी व्यक्ति को उसकी त्रासदी से नहीं, उसकी संपूर्ण यात्रा, विचार और कर्म से देखा जाना चाहिए।
क्षमा, लोकतंत्र और वैचारिक असहमति पर भी सवाल
जब उनसे यह भी पूछा कि जिन लोगों के कारण उन्हें इतनी बड़ी शारीरिक क्षति हुई, क्या वे उन्हें क्षमा कर पाए हैं? बातचीत में लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक असहमति से जुड़े प्रश्न भी उठे।
सवाल यह भी था कि यदि लोकतंत्र में विचारों के मतभेद स्वाभाविक हैं तो असहमति हिंसा का रूप क्यों लेती है? और क्या राजनीतिक विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति को भी समान रूप से अपनी बात कहने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
इन सवालों के बीच सदानंदन मास्टर ने अपने जीवनानुभवों के आधार पर लोकतांत्रिक मूल्यों, वैचारिक दृढ़ता और सामाजिक संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
“हिंदू राष्ट्र” और संघ की अवधारणा पर भी हुआ संवाद
बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संघ की विचारधारा और “हिंदू राष्ट्र” की अवधारणा को लेकर रहा। एक सीधा सवाल था कि संघ को अक्सर केवल हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से जोड़कर देखा जाता है और पूछा कि इस अवधारणा में अन्य धर्मों और विचारधाराओं के लिए क्या स्थान है।
इस प्रश्न ने कार्यक्रम को केवल व्यक्तिगत जीवन-कथा से निकालकर समकालीन वैचारिक विमर्श के व्यापक क्षेत्र में पहुंचा दिया। अवसाद पर वे बोले, यह कमजोरी नहीं, चिकित्सकीय स्थिति है।युवाओं की मानसिक चुनौतियों पर भी बातचीत हुई। तनाव, चिंता, भय, तुलना और भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसे विषयों के संदर्भ में अवसाद को लेकर सवाल किया गया।
सदानंदन मास्टर से यह भी पूछा गया कि क्या उन्होंने स्वयं कभी ऐसी मानसिक चुनौती का सामना किया और विपरीत परिस्थितियों से बाहर आने में उन्हें किस शक्ति ने सहारा दिया। उनके जीवन की यात्रा के संदर्भ में आत्मविश्वास, उद्देश्यबोध, सामाजिक जुड़ाव और सकारात्मक दृष्टि प्रमुख विषय बनकर सामने आए।
जेन-जी से लेकर युवा पीढ़ी की बेचैनी तक
बदलती युवा पीढ़ी, जेन-जी के आंदोलनों, बदलते सामाजिक प्रश्नों और संघ के बदलते संवाद पर भी सवाल किए। इसके साथ ही पूछा गया कि आज के युवाओं को तनाव, चिंता, तुलना, भय और अवसर छूट जाने की आशंका जैसी चुनौतियों से कैसे निपटना चाहिए।
एक शिक्षक के रूप में सदानंदन मास्टर से अपेक्षा की गई कि वे युवा पीढ़ी के लिए कोई स्पष्ट जीवन-संदेश दें। संवाद का यह हिस्सा विशेष रूप से इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा कि सदानंदन मास्टर का व्यक्तित्व अतीत के संघर्ष से वर्तमान की युवा चुनौतियों तक एक सेतु के रूप में सामने आया।
“मतभेद से अधिक भयावह है नफरत”
देश में बढ़ते वैचारिक मतभेदों के संदर्भ में उनसे पूछा गया कि उन्हें मतभेद अधिक भयावह लगते हैं या नफरत। इस प्रश्न के माध्यम से बातचीत उस बिंदु तक पहुंची जहां लोकतंत्र केवल चुनाव और संस्थाओं का विषय नहीं रह जाता, बल्कि असहमति को स्वीकार करने की सामाजिक क्षमता का प्रश्न बन जाता है।
सांसद की दृष्टि और शिक्षक की दृष्टि में समाज!
हार्दिक दवे ने उनसे एक और विशिष्ट सवाल किया, “एक शिक्षक की नजर से समाज कैसा दिखाई देता है और एक सांसद की नजर से समाज कैसा?”
यह प्रश्न सदानंदन मास्टर के व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण पक्षों, शिक्षक और जनप्रतिनिधि, को एक साथ सामने लाता है। एक ओर वर्षों तक विद्यार्थियों के बीच काम करने का अनुभव और दूसरी ओर देश की सर्वोच्च विधायी संस्था में प्रतिनिधित्व का दायित्व, दोनों ने उनके सामाजिक दृष्टिकोण को अलग-अलग स्तरों पर समृद्ध किया है।
इंदौर को बताया सौभाग्य की भूमि!
अपने संबोधन में सदानंदन मास्टर ने मध्यप्रदेश और इंदौर से अपने आत्मीय संबंध का उल्लेख किया। उन्होंने इस भूमि को अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता की कर्मभूमि, स्वतंत्रता सेनानियों की धरती तथा उज्जैन, महाकालेश्वर और सांदीपनि आश्रम जैसी पवित्र परंपराओं से जुड़ी भूमि बताया। उन्होंने कहा कि इंदौर आना, यहां उपस्थित लोगों से मिलना और उनके साथ समय बिताना उनके लिए परम सौभाग्य है।
दीपक जैन और ‘सार्थक’ के प्रयासों की सराहना
सदानंदन मास्टर ने आयोजन के लिए संस्था ‘सार्थक’ और उसके कार्यकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से संस्था के प्रमुख दीपक जैन “टीनू” के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उन्हें ऊर्जावान युवा कार्यकर्ता बताया। उन्होंने कहा कि इंदौर आने का अवसर दीपक जैन के प्रयासों से प्राप्त हुआ और यहां मिले स्नेह एवं आत्मीयता को वे अपने प्रदेश के लोगों के साथ साझा करेंगे।
“एक सदानंदन गिरा तो दूसरा सदानंदन आएगा”
कार्यक्रम के समापन चरण में युवाओं और समाज के लिए संदेश की अपेक्षा के बीच बातचीत अपने सबसे भावनात्मक बिंदु पर पहुंची। सदानंदन मास्टर के संघर्ष से निकला संदेश यही रहा कि व्यक्ति समाप्त हो सकता है, लेकिन आदर्श और विचार की यात्रा समाप्त नहीं होती। उन्होंने अपने जीवन को किसी व्यक्तिगत विजय के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे उन सभी लोगों के संघर्ष से जोड़ा, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने विश्वास को जीवित रखा।
कार्यक्रम में प्रस्तुत अंतिम भाव, “क्या हुआ जो एक पत्ता टूटकर गिरा जमीन पर, कल नई कोंपलें आएंगी…” ने पूरे आयोजन के मूल भाव को एक प्रतीकात्मक विस्तार दिया।
एक आयोजन से आगे, संवाद की नई जमीन
संस्था ‘सार्थक’ का यह आयोजन महज एक प्रेरक व्याख्यान तक सीमित नहीं रहा। सदानंदन मास्टर के संघर्षपूर्ण जीवन-संस्मरण और हार्दिक दवे के बेबाक सवालों ने कार्यक्रम को विचार, अनुभव और समकालीन सामाजिक प्रश्नों के संवाद में बदल दिया।
एक ओर तीन दशक पुराने राजनीतिक संघर्ष की स्मृतियां थीं, दूसरी ओर लोकतंत्र, वैचारिक असहमति, युवा पीढ़ी, मानसिक स्वास्थ्य, राष्ट्रबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे वर्तमान के प्रश्न। इस अर्थ में ‘सार्थक’ की यह पहल एक व्यक्ति की संघर्षगाथा सुनने से आगे बढ़कर समाज के सामने यह प्रश्न रखने में सफल रही कि कठिन परिस्थितियों में विचार, विश्वास और मनुष्य की जिजीविषा किस तरह अपना रास्ता बनाती है।
कार्यक्रम में संवाद के सूत्रधार श्री हार्दिक दवे ने किया।
कार्यक्रम में संस्था सार्थक के अध्यक्ष श्री नितेश मुच्छाल जी के साथ संस्था के सदस्य श्री पंकज जैन जी, श्री अमित सोनी, श्री सिद्धार्थ निखरा जी, श्री नितिन जोशी जी, श्री आनंद बोकड़िया जी, श्री तुषार गावड़े जी, श्री गौरव नाहर जी, श्री केशव पोरवाल जी, कार्यक्रम का संचालन श्री विशाल डकोलिया , आभार श्री अंकित रावल ने मान। इस अवसर पर गणमान्यजन व युवा साथी उपस्थित रहे।
