जो लोग वर्षों तक कॉलेज कैंपस को अपनी वैचारिक प्रयोगशाला बनाकर बैठकों, गोलमेज चर्चाओं और चुनिंदा लोगों के साथ बैठ कर एजेंडा चलाते थे, आज वही लोग राष्ट्रवाद की आवाज सुनकर बेचैन हो रहे हैं। असल तकलीफ राष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि अपने पुराने ‘नैरेटिव’ के खत्म होने से है। अब जब डेली कॉलेज कैंपस में देश की बात हो रही है, सेना के सम्मान की बात हो रही है, तो इन्हें क्यों तकलीफ हो रही है ।जनता सब समझ चुकी है जो लोग कभी देशहित की आवाज दबाते थे, आज वही लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी का पाठ पढ़ा रहे हैं। यह दोहरा चरित्र अब नहीं चलेगा। नई पीढ़ी जाग चुकी है। कैंपस अब राष्ट्र निर्माण का केंद्र बनेगा, न कि राजनीतिक स्वार्थों का अड्डा।
