इंदौर में होने जा रहा है आयोजन विभिन्न प्रदेशों से प्रविष्टियां मिली
परिचय पुस्तिका का होगा विमोचन
इंदौर। इंदौर में राजपूत परिषद जिला इंदौर द्वारा विवाह योग्य युवक युवती परिचय सम्मेलन चिमन बाग स्थित स्काउट ग्राउंड मैदान पर आयोजित किया जाएगा । 25 जनवरी को होने वाले अखिल भारतीय विवाह योग्य निःशुल्क युवक युवती परिचय सम्मेलन की तैयारीया अंतिम चरणों में है ।
राजपूत परिषद के प्रदेश अध्यक्ष अरविंद सिंह ठाकुर और जिला अध्यक्ष ठाकुर राम सिंह दिखीत……………
ने बताया कि विवाह योग्य अखिल भारतीय निःशुल्क युवक युवती परिचय सम्मेलन इंदौर के चिमन बाग स्थित स्काउट ग्राउंड मैदान में होगा। इस आयोजन के लिए मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान, हरियाणा छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न प्रदेशों से अब तक 700 से अधिक प्रविष्टियां मिल चुकी है।
महिला विंग के अध्यक्ष श्रीमती अर्पिता सिकरवार मात्र शक्तियों के साथ मिलकर डिजिटल के माध्यम से और घर-घर संपर्क अभियान चलाकर प्रविष्टियां भरवाने का काम कर रही है। इसके लिए संभाग स्तर पर अलग-अलग क्षेत्र में मात्र शक्तियों की बैठकर भी आयोजित की जा रही हैं ।
आयोजन के लिए प्रमुख रूप से अरविंद सिंह ठाकुर , राम सिंह दिखीत, महेंद्र सिंह बेस स्वजातीय बंधुओं से संपर्क कर रहे हैं ।
[12:02 pm, 20/01/2026] Abhishek Raghuvanshi sir: माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजी विद्यालयों में 25% आरटीई कोटे के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु राज्यों को नियम बनाने का निर्देश दिया गया है।
यह निर्देश विधि के क्षेत्र में कोई नवीन अवधारणा नहीं है, बल्कि पूर्व से स्थापित संवैधानिक और वैधानिक स्थिति की पुनः पुष्टि है।
उल्लेखनीय है कि लगभग एक वर्ष पूर्व, माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ द्वारा Writ-C No. 6035 of 2025 में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि—
अनुच्छेद 21-A के अंतर्गत प्रदत्त शिक्षा का अधिकार एक enforceable right है
RTE Act, 2009 की धारा 12(1)(c) पढ़ी जाए धारा 2(n) के साथ
निजी विद्यालयों द्वारा प्रवेश देने के बाद बच्चे को पढ़ने से रोकना कानूनन अस्वीकार्य है
विद्यालय के प्रधानाचार्य को अवमानना की कार्यवाही तक के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है
माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि आरटीई के अंतर्गत चयनित बच्चे को तत्काल विद्यालय में पढ़ने दिया जाए, अन्यथा यह न्यायालय के आदेश की अवहेलना होगी।
माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश वस्तुतः उसी विधिक सिद्धांत की राष्ट्रीय स्तर पर पुनः पुष्टि है, जिसे उच्च न्यायालय पहले ही स्थापित कर चुका है।
शिक्षा का अधिकार कोई अनुग्रह नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त बाध्यकारी अधिकार है।
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