मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय का इंदौर में स्वागत, महापौर बोले वर्षों के संघर्ष और बलिदान का मिला प्रतिफल
भोजशाला को लेकर आए ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय पर पुष्यमित्र भार्गव ने गहरी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे भारतीय आस्था, संस्कृति और सत्य की विजय बताया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय केवल एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे संघर्ष, असंख्य लोगों के त्याग और भारत की सांस्कृतिक चेतना के सम्मान का प्रतीक है।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि “आज अत्यंत हर्ष का दिन है। आक्रांताओं द्वारा जबरन माँ वाग्देवी के प्राचीन मंदिर भोजशाला के स्वरूप को बदलने का जो प्रयास किया गया था, उस पर माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देकर स्पष्ट कर दिया है कि यह संरचना मूलतः मंदिर है।
उन्होंने कहा कि धर्म, कला, संस्कृति और ज्ञान का यह महान केंद्र ऐतिहासिक परिस्थितियों और विभिन्न शासनकालों के कारण अपनी मूल पहचान से दूर चला गया था। समय के साथ यहाँ नमाज़ और पूजा से संबंधित विभिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाएँ लागू की गईं, लेकिन वर्तमान न्यायिक निर्णय ने ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक साक्ष्यों और वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है।
महापौर ने विशेष रूप से इस बात का स्वागत किया कि न्यायालय ने पूर्व में जारी उन आदेशों को निरस्त कर दिया है, जिनके तहत परिसर में नमाज़ की अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा कि अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में इस परिसर का उपयोग मंदिर और ज्ञान-केंद्र के स्वरूप के अनुरूप किया जाएगा। यहाँ पुनः अध्ययन शास्त्रार्थ और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए मार्ग प्रशस्त होगा।
माँ वाग्देवी की प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला में पुनः स्थापित किए जाने के विषय पर महापौर ने कहा कि न्यायालय ने इस मुद्दे पर भी संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया है। उन्होंने बताया कि संबंधित सक्षम प्राधिकरण के समक्ष कई अभ्यावेदन लंबित हैं और न्यायालय ने उनके विधिसम्मत निराकरण तथा प्रतिमा की वापसी के लिए आवश्यक प्रयास करने की अपेक्षा व्यक्त की है।
महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि भोजशाला आंदोलन केवल एक धार्मिक संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और ज्ञान परंपरा के पुनर्स्थापन का अभियान था। इस संघर्ष में अनेक लोगों ने वर्षों तक निरंतर प्रयास किए और कुछ ने अपने प्राणों का बलिदान भी दिया। उन्होंने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण की वैज्ञानिक रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों, शिलालेखों और अन्य प्रमाणों के आधार पर न्यायालय ने जो निर्णय दिया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह निर्णय भारत की गौरवशाली सभ्यतागत विरासत को पुनः प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा और भोजशाला एक बार फिर माँ वाग्देवी की आराधना, शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में अपनी पहचान को सुदृढ़ करेगा।
