इंदौर। इस बार सिंहस्थ में शिप्रा नदी में शुद्ध पानी में श्रद्धालुओं को स्नान करवाया जाएगा, जिसके चलते 700 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च की जा रही है। अभी तक नर्मदा का पानी ही स्नान के लिए करोड़ों रुपए की राशि खर्च कर खरीदना पड़ता था और इंदौर की कान्ह नदी का गंदा पानी भी शिप्रा में मिलता रहा है। अब यह पानी सीधा 100 फीट गहरी टनल के जरिए गंभीर नदी में पहुंचेगा और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के बाद इस पानी का इस्तेमाल किसान सिंचाई के लिए कर सकेंगे। 12 किलोमीटर लम्बी टनल का अभी तक 4 किलोमीटर कार्य पूर्ण भी हो चुका है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के स्पष्ट निर्देश हैं कि इस बार सिंहस्थ में किसी भी तरह गंदे पानी की शिकायत नहीं आना चाहिए, जिसके चलते यह क्लोज डक्ट प्रोजेक्ट अमल में लाया जा रहा है।
अभी तक हालांकि कान्ह-सरस्वती नदी शुद्धिकरण पर ही एक हजार करोड़ से अधिक की राशि फूंकी जा चुकी है और अब नमामि गंगे प्रोजेक्ट और अमृत 2.0 के तहत भी फिर से कान्ह शुद्धिकरण प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। नगर निगम ने जितने भी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए हैं वे भी कारगर साबित नहीं हो पाए और अभी भी नालों के साथ-साथ नदी में दूषित पानी मिलता है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री ने सिंहस्थ-2028 के मद्देनजर कान्ह नदी के गंदे पानी को शिप्रा में मिलने से रोकने के लिए यह क्लोज डक्ट प्रोजेक्ट मंजूर करवाया, जिसमें इंदौर रोड स्थित जमालपुरा से टनल का निर्माण शुरू होकर 12 किलोमीटर तक बनाई जाएगी।
हालांकि जो नई डायवर्शन लाइन डाली जा रही है वह 18 किलोमीटर लम्बी होगी और इससे कान्ह नदी का गंदा पानी बिना शिप्रा में मिले टनल के जरिए सीधे गंभीर में पहुंचेगा और शुद्धिकरण के बाद इस पानी का इस्तेमाल किसान सिंचाई, निर्माण या अन्य कार्यों के लिए कर सकेंगे। जमीन के भीतर 100 फीट गहराई में इस टनल का निर्माण तेज गति से चल रहा है और कल भी अधिकारियों ने इसका अवलोकन किया। चिंतामण जवासिया स्थित सॉफ्ट-2 में उतरकर टनल निर्माण कार्यों का जायजा लिया गया।
अभी तक लगभग 4 किलोमीटर टनल का निर्माण हो चुका है, जिसमें अत्याधुनिक मशीनों और तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस टनल की मदद से ही कान्ह नदी का गंदा पानी अंडरग्राउंड निकासी के चलते शिप्रा में नहीं मिलेगा और गंभीर नदी के निचले हिस्से में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से पानी को साफ कर छोड़ा जाएगा, जिसका उपयोग किया जा सकेगा। यह इस तरह का अनूठा प्रोजेक्ट है, जो पहली बार आजमाया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह तकनीक अगर सफल रही तो बरसाती नदियों के साथ-साथ सूख चुकी नदियों का जुड़ाव भी इस तरह टनल बनवाकर किया जा सकेगा। ठेकेदार कंपनी को ही 15 साल तक इसका रखरखाव भी करना पड़ेगा और बारिश के बाद जो पानी अधिक जमा होता है उसे भी बायपास करने में आसानी रहेगी। पिछले सिंहस्थ में भी 150 करोड़ रुपए से अधिक की राशि कान्ह डायवर्शन प्रोजेक्ट पर खर्च की गई थी, जिसमें राघोपीपल्या से लेकर केडी पैलेस तक पाइप लाइन डालकर कान्ह के गंदे पानी को डायवर्ट किया गया था, मगर यह योजना कारगर साबित नहीं हुई और गंदा पानी शिप्रा में मिलता रहा, जिसके चलते अब आगामी सिंहस्थ के मद्देनजर यह क्लोज डक्ट प्रोजेक्ट अमल में लाया जा रहा है।
