ठंडे दिमाग से पढ़ें और विषय की गंभीरता को समझें।*

By Abhishek Raghuvanshi
2 Min Read

यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो जाता है और उसकी मृत्यु के बाद शरिया के अनुसार उसकी 4 पत्नियाँ हैं, तो उसे पेंशन कैसे दी जाती है?

उत्तर:-

नामांकनों को देखा जाता है और यह तय किया जाता है कि किसको कितना प्रतिशत देना है।
यदि कोई नामांकन नहीं होता है, तो चारों के बीच 25% वितरित किया जाता है।
यदि पत्नियों में से एक की मृत्यु हो जाती है, तो अन्य तीन को 33.33 प्रतिशत भुगतान करना होगा।
यदि दूसरी पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो शेष दो का 50% हिस्सा होता है।
अगर तीसरी पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो बाद वाली को 100% पेंशन मिलती है।

अब सोचो…..वह
यदि पहली पत्नी की आयु ६० वर्ष, दूसरी की ५० वर्ष, तीसरी की ४० वर्ष की तथा चौथी की ३० वर्ष की है, और यदि सभी की आयु लगभग ७० वर्ष है, तो उनकी कुल पेंशन वर्ष –
१० + २० + ३० + ४० = १०० वर्ष। इसका मतलब है कि मुस्लिम व्यक्ति को सरकार की ओर से 100 साल तक पेंशन मिलेगी….

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इसकी तुलना में किसी अन्य धार्मिक व्यक्ति की पत्नी को अधिकतम 10 या 20 वर्ष पेंशन मिलेगी !!

इसका मतलब है कि चौथी पत्नी आजीवन मुफ्त पेंशन पाने के लिए सेवानिवृत्ति से पहले एक मुस्लिम वयस्क से शादी करती है।और जब उसका इंतक़ाल हो जाता है तो गुपचुप निकाह उसके बड़े बेटे से कर लेती है जो उस आदमी की पहली पत्नी से था ।
अब यह सर्वे करना जरूरी है कि शरीयत का फायदा उठाकर कितने फीसदी मुसलमान 55 साल की उम्र के बाद शादी कर लेते हैं?
यदि यह प्रतिशत अधिक है तो यह सरकारी खजाने से मुस्लिम महिलाओं को कानूनी सुविधा प्रदान करने की साजिश है।

कॉमन सिविल कोड – इसकी आवश्यकता क्यों है, यह अब समझ में आएगा।

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