इंदौर जैसे जागरूक और प्रगतिशील शहर में इन दिनों जो दृश्य उभर रहा है, वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है। अफसरशाही अपनी सीमाएँ लांघ चुकी है, और अब उसकी भाषा में जनसेवा नहीं, बल्कि सत्ता का अहंकार झलकता है।
कुछ अधिकारी इस भ्रम में हैं कि सरकारी कुर्सी उन्हें जनादेश से ऊँचा बना देती है। वे शहर की नीतियों, चुने हुए जनप्रतिनिधियों और नागरिक भावनाओं सभी को दरकिनार कर अपने आदेशों को अंतिम सत्य मानने लगे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल लोकतंत्र की भावना का अपमान है, बल्कि प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करती है।
लोकतंत्र का सार यह है कि शासन जनता की भागीदारी और संवाद पर टिका हो। परंतु इंदौर में हाल के दिनों में संवाद की जगह धमकियों और निर्देशों ने ले ली है। जनप्रतिनिधियों को दरकिनार कर कार्रवाई करना, बिना अनुमति घरों में घुसना, और नागरिकों से अपमानजनक व्यवहार करना यह सब उस “अधिनायकवादी मानसिकता” का प्रमाण है जो किसी भी लोकतंत्र के लिए ज़हर से कम नहीं।
सबसे विडंबनापूर्ण पक्ष यह है कि कुछ अवसरवादीयो ने भी अफसरशाही के आगे अपना पेन रख दिया है। निजी स्वार्थ और लाभ के लिए लिखी जा रही यह “प्रशासन समर्थक” भाषा लोकतंत्र की प्रहरी नहीं, बल्कि उसकी कब्र खोदने का काम कर रही है।
यह प्रश्न अब केवल इंदौर का नहीं, बल्कि उस पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का है जो जवाबदेही और संतुलन पर टिका है। अगर नौकरशाही को बिना अंकुश के मनमानी की छूट मिलती रही, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर करेगी।
“सेवक” कहलाने वाले अधिकारी वास्तव में सेवा की भावना में काम करें, न कि अपने अधिकारों के घमंड में, लोकतंत्र की प्रतिष्ठा तभी बचेगी, जब व्यवस्था में संतुलन, संवाद और जवाबदेही कायम रहे।
