मप्र हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने महू कैंटोनमेंट बोर्ड की उस नोटिस पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें अल-फलाह यूनिवर्सिटी के चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी के पुश्तैनी घर में कथित अनधिकृत निर्माण हटाने का आदेश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि तीन दशक पुराने नोटिस के बाद अचानक की गई कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए था।
बता दें कि सिद्दीकी को 18 नवंबर को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार किया था। ईडी ने अल-फलाह ग्रुप, इससे जुड़े लोगों और फरीदाबाद स्थित यूनिवर्सिटी के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इसके अगले दिन यानी 19 नवंबर को कैंट बोर्ड ने नोटिस जारी कर तीन दिन में निर्माण हटाने को कहा था।
59 वर्षीय अब्दुल माजिद, जो इस घर में रहते हैं, ने हाई कोर्ट में याचिका लगाकर नोटिस को चुनौती दी। माजिद ने दावा किया कि उन्हें यह संपत्ति 2021 में ‘हिबा’ (इस्लामिक गिफ्ट) के तहत दी गई थी और उनके पास हिबानामा मौजूद है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अजय बागड़िया ने दलील दी कि बोर्ड ने बिना सुनवाई का मौका दिए सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया।
वहीं बोर्ड की ओर से वकील अशुतोष निमगांवकर ने कहा कि पहले भी नोटिस दिए गए थे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा ने आदेश में कहा कि पिछले नोटिस 1996-97 में जारी हुए थे, 30 साल पुराने। इतने लंबे समय बाद कार्रवाई करते हुए सुनवाई का अवसर देना आवश्यक था। अदालत ने निर्देश दिया कि माजिद 15 दिनों में अपना जवाब और दस्तावेज बोर्ड को दें। इसके बाद बोर्ड उन्हें सुनवाई का पूरा अवसर दे और स्पीकिंग ऑर्डर जारी करे।
कोर्ट ने कहा कि सुनवाई की पूरी प्रक्रिया पूरी होने तक और उसके बाद भी 10 दिन तक यदि आदेश याचिकाकर्ता के विरुद्ध आता है, तब भी किसी प्रकार की जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह मामले के मेरिट्स पर कोई राय नहीं दे रही है।
अधिकारियों के अनुसार, सिद्दीकी मूल रूप से महू के रहने वाले हैं। उनके पिता हम्माद अहमद, जो वर्षों तक नगर के काजी रहे, अब नहीं रहे। बोर्ड के रिकॉर्ड में मकान नंबर 1371, मुकेरी मोहल्ला, महू, उनके नाम पर दर्ज है।
