इंदौर में सार्वजनिक परिवहन सेवा की आड़ में वर्षों से चल रही दबंगई और लापरवाही का ताजा उदाहरण एक बार फिर सामने आया है। शहर की कुख्यात हंस ट्रेवल्स, जो पहले भी कई बार यात्रियों के साथ बदसलूकी और अव्यवस्थाओं को लेकर चर्चा में रह चुकी है, अब एक मासूम बच्चों के साथ सफर कर रहे परिवार से मारपीट और गालीगलौज के मामले को लेकर कटघरे में है। यह शर्मनाक घटना रविवार, 8 जून की शाम उस समय घटी जब इंदौर निवासी हरीश चौधरी अपनी पत्नी रुक्मणी चौधरी, दो साल की बेटी और सात साल के बेटे के साथ हंस ट्रेवल्स की हैदराबाद जाने वाली स्लीपर कोच (बस क्रमांक ए आर 11E 1500) में सवार होने पहुंचे। बस का समय शाम 4 बजे था और स्थान था इंदौर का आईटी पार्क स्थित बस स्टैंड।
हरीश चौधरी अपने साथ दो छोटे बैग और पांच किलो आम की एक पेटी लेकर आए थे। जैसे ही वे सामान बस में रखने लगे, बस के क्लीनर ने आम की पेटी को बस में रखने के एवज में 300 रुपये की मांग की। हरीश ने यह स्पष्ट किया कि उन्होंने दो सीटें बुक की हैं और यह सामान्य लगेज में आता है, इस पर ट्रेवल्स स्टाफ ने अभद्रता शुरू कर दी।
हरीश के परिजनों ने बताया कि जब उन्होंने 100 रुपये तक देने की पेशकश की, तो स्टाफ ने गाली-गलौज करते हुए उन्हें बस से उतारने की धमकी दी। विरोध करने पर क्लीनर, कंडक्टर और ड्राइवर ने न सिर्फ हरीश बल्कि उनकी पत्नी, बच्चों और उन्हें छोड़ने आए परिजनों से मारपीट की।
पीड़ित परिवार के सदस्य विजय चौधरी ने बताया कि बस स्टाफ नशे की हालत में था। उनमें से दो ने शराब पी रखी थी और बौखलाहट में एक कर्मचारी ने रोड जैसी किसी लोहे की वस्तु से मारने की कोशिश भी की।
विजय ने बताया कि जब उन्होंने ट्रेवल्स के टोल फ्री नंबर पर संपर्क किया और शिकायत दर्ज करवानी चाही, तो वहां से भी बेहद लापरवाह जवाब मिला। “उन्होंने मजाक में टाल दिया और कहा कि बस छोड़ दीजिए, हम कुछ नहीं कर सकते। यह पहला मामला नहीं है जब हंस ट्रेवल्स विवादों में आई हो। इससे पहले भी कई बार यात्रियों से दुर्व्यवहार, सामान चोरी, महिलाओं के साथ गलत व्यवहार और टिकट होने के बावजूद बस में जगह न मिलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। बावजूद इसके, ट्रेवल्स के खिलाफ प्रशासन द्वारा कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
कुछ यात्रियों का यह भी आरोप है कि हंस ट्रेवल्स के कुछ कर्मचारियों के पुलिस महकमे और प्रशासनिक अधिकारियों से मिली भगत है, जिसकी वजह से इनकी दबंगई लगातार जारी है।क्या कभी रुकेगी हंस ट्रेवल्स की गुंडागर्दी?इस घटना के बाद बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इंदौर प्रशासन हंस ट्रेवल्स की इस निरंकुशता पर कोई ठोस कदम उठाएगा या यह मामला भी बाकी मामलों की तरह धूल फांकता रहेगा? जहां एक ओर मुख्यमंत्री और परिवहन विभाग यात्रियों की सुविधा के दावे करते नहीं थकते, वहीं दूसरी ओर शहर की सड़कों पर ऐसे ‘प्राइवेट गुंडों’ का राज चलता नजर आता है।समाप्ति से पहले एक सवाल – किसका शहर, किसकी व्यवस्था?जब एक जिम्मेदार परिवार, अपने बच्चों के साथ, टिकट होने के बावजूद, अपने ही शहर की एक बस में सुरक्षित नहीं है, तो फिर सवाल केवल हंस ट्रेवल्स पर नहीं, पूरे व्यवस्था तंत्र पर उठते हैं।क्या इंदौर की पहचान ऐसे बदनाम ट्रेवल्स के सहारे बनेगी, या कोई सख्त कदम अब उठाया जाएगा?
