इंदौर में प्रशासन की जनसुनवाई…यह मानवीयता का पुनर्जन्म.. और इसके केंद्र में खड़े हैं कलेक्टर शिवम वर्मा

By Abhishek Raghuvanshi
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इंदौर के प्रशासनिक संकुल में हर मंगलवार सिर्फ जनसुनवाई नहीं होती, वहाँ मानो व्यवस्था का नहीं,मानवता का दरबार लगता है। कलेक्टर शिवम वर्मा जिस संयम, संवेदना और सहजता के साथ लोगों की पीड़ा सुनते हैं, वह प्रशासनिक ढांचे में आज कहीं दुर्लभ-सा गुण लगता है। यह वही शिवम वर्मा हैं, जिन्होंने निगम आयुक्त रहते हुए इंदौर नगर निगम की जनसुनवाई को फिर से जीवंत कर दिया था,बीते वर्षों में शहर ने देखा कि किस तरह बंद कमरों से बाहर निकलकर सुनवाई सीधे ज़मीन पर पहुंचने लगी। आज वही दृष्टि, वही संवेदना ज़िले के कलेक्टर कार्यालय में और व्यापक रूप में दिखाई दे रही है।
इस मंगलवार की जनसुनवाई में एक दृश्य ऐसा था जिसने हर आंख को ठिठका दिया..दिव्यांग सुनील आहूजा, जो बेहद अस्त-व्यस्त अवस्था में अपनी याचिका लेकर पहुंचे थे। कई प्रशासनिक तंत्र ऐसे दृश्य देखकर नज़रें फेर लेते हैं, लेकिन कलेक्टर वर्मा ने सुनील को देखा और सिर्फ समस्या नहीं देखी,एक आदमी की टूटी गरिमा देखी। उन्होंने तुरंत निर्देश दिए कि सुनील को स्नान कराया जाए, दाढ़ी-केश कटिंग करवाई जाए, और उन्हें नए, साफ-सुथरे वस्त्र पहनाए जाएं। महाकाल ग्रुप की टीम ने सामाजिक न्याय विभाग के साथ मिलकर यह काम मिनटों में पूरा किया।
कुछ ही देर बाद वही सुनील,जो कुछ समय पहले समाज की हाशिये पर दिखते थे..सम्मान, आत्मविश्वास और सजे-धजे स्वरूप में सभी के सामने खड़े थे।यह प्रशासन के भीतर छिपी संवेदनशीलता की पुनर्स्थापना जैसा था ।
कलेक्टर वर्मा यहीं नहीं रुके,सुनील को मोट्रेट ट्राइसिकल और पेंशन भी स्वीकृत की। यह मदद किसी दया की तरह नहीं, बल्कि सम्मान के साथ दी गई। जैसे किसी नागरिक को उसका खोया अधिकार वापस मिला हो।
इसी जनसुनवाई में एक और प्रेरक प्रसंग सामने आया..होनहार बालिका रक्षा रंगानी आई। उसके सपने बड़े थे: IIT से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का कोर्स करने का सपना था,लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी । लेकिन उसके शब्दों में आत्मविश्वास था। कलेक्टर वर्मा ने बिना देर किए 50 हजार रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की। रक्षा की आंखों में चमक थी, पर उससे बड़ी बात उसके शब्द थे कि“मैं आगे चलकर किसी और ज़रूरतमंद बालिका की मदद करना चाहती हूँ।”
यहां एक मदद ने सिर्फ एक सपना नहीं सँवारा, भविष्य की एक नई परंपरा भी बो दी। इसी तरह देपालपुर के दिव्यांग जीवन मालवीय को तुरंत ट्राइसिकल और 15 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी गई। कैंसर पीड़ित महिला के लिए तत्काल नि:शुल्क उपचार के आदेश दिए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना के नीलगिरी परिसर की समस्याओं को सुनकर कलेक्टर ने बोरिंग, लिफ्ट मरम्मत और सुरक्षा व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए, और एक कैंप लगाकर सभी समस्याएँ हल करने का आदेश दिया। 275 आवेदनों में से जो तत्काल संभव था, उसे वहीं हल किया गया। बाकी के लिए तय समयसीमा में कार्रवाई जारी है।
कलेक्टर शिवम वर्मा की कार्यशैली में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे फाइल नहीं देखते,बल्कि लोग देखते हैं। वे समस्या नहीं सुनते,बल्कि दर्द सुनते हैं और वे समाधान नहीं करते,विश्वास पैदा करते हैं।
आज जब व्यवस्था का चेहरा अकसर कठोर और औपचारिक नजर आता है, तब शिवम वर्मा का यह भावनात्मक, मानवीय और गरिमामय हस्तक्षेप यह भरोसा जगाता है कि प्रशासन सिर्फ आदेशों का तंत्र नहीं,दिल की धड़कन भी है।
इंदौर की जनसुनवाई इसलिए सफल नहीं, कि वहाँ समाधान मिलता है…
बल्कि इसलिए सफल है, क्योंकि वहाँ कोई आपको इंसान समझकर सुनता है।
कलेक्टर शिवम वर्मा इस शहर के प्रशासनिक ढांचे में एक पदाधिकारी नहीं,बल्कि वे उस पुल की तरह हैं जो व्यवस्था और नागरिकों के बीच विश्वास वापस जोड़ता है।और शायद यही वह गुण है, जो आज हर व्यवस्था को सबसे ज़्यादा चाहिए।

        अभिषेक मिश्रा
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