डॉक्टर की अनुमति के बगैर नहीं हो सकते गंभीर व्यक्ति के बयान

By Abhishek Raghuvanshi
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जिला एवं सत्र न्यायालय ने हत्या के एक मामले में फैसला जारी करते हुए कहा कि सरकारी अस्पताल के आकस्मिक चिकित्सा केंद्र में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति बयान देने की स्थिति में है या नहीं? यह सरकारी डॉक्टर तय करता है।
डॉक्टर की अनुमति के बाद ही पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी मृत्यु पूर्व बयान ले सकते हैं। बगैर डॉक्टर की अनुमति के मां, पत्नी और अन्य परिजन को बयान देना शंकास्पद प्रतीत होता। वहीं परिवारजन के बयान भी विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। ऐसे में पुलिस की कहानी को सही नहीं माना जा सकता।
अपर सत्र न्यायाधीश नरसिंह बघेल की कोर्ट के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई थी। 18 जनवरी 2022 को कंडीलपुरा में साहिल नामक व्यक्ति पर साहिल नाम के ही दूसरे व्यक्ति ने हमला कर दिया था। बीच बचाव करने यश नामक युवक आया तो उस पर भी आरोपी साहिल ने हमला कर दिया था। दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए थे। दोनों को एमवाय अस्पताल की आकस्मिक चिकित्सा केंद्र में भेजा गया। घायल साहिल की हालत बेहद खराब थी। उपचार के दौरान मृत्यु हो गई। पुलिस ने जांच के बाद यश की गवाही पर साहिल के खिलाफ जांच के बाद चालान पेश किया। इसमें उल्लेख किया कि साहिल ने चाकू से साहिल पर वार किए थे। मैं बचाने गया तो मुंह व शरीर के अन्य हिस्सों पर वार कर दिए थे।
मां व पत्नी का प्रतिपरीक्षण
आरोपी साहिल की ओर से अधिवक्ता महेंद्र मौर्य, श्रेष्ठा जोशी ने दिवंगत साहिल की मां और प|ी का प्रतिपरीक्षण किया। प|ी ने कहा कि जब मैं अस्पताल पहुंची तो साहिल ने मेरे सामने ज्यादा कुछ नहीं कहा, उस वक्त सास साथ नहीं थी, जबकि सास ने कहा कि बहू भी मेरे साथ थी। घायल यश भी अपने बयान से मुकर गया। कोर्ट ने माना कि सरकारी अस्पताल की आकास्मिक चिकित्सा केंद्र में इस तरह परिवार को दिए बयान को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। बगैर डॉक्टर की अनुमति के परिवार को बयान दिया जाना संदेहास्पद है।

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