सुमित्रा महाजन ने पूरे घटनाक्रम पर चर्चा करते हुए यह भी जता दिया कि इस तरह के घटनाक्रम की जानकारी खुद वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं है। महाजन की बात से यह भी साफ हो गया कि या तो इंदौर में हुए घटनाक्रम की जानकारी संगठन को नहीं थी या फिर अचानक सब कुछ हुआ।
भले लोग कह रहे हैं कि वास्तव में जो भाजपा है उसमें ऐसा नहीं होता- सुमित्रा महाजन
इंदौर। चुनावी बेला में कांग्रेस प्रत्याशी को अपने पाले में लाने का कदम भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को रास नहीं आ रहा है। नई दौर की राजनीति कर रहे नेता भले ही अक्षय बम को खींच लाने को पार्टी की उपलब्धि बताते घूम रहे हैं लेकिन वरिष्ठ नेता इससे सहमत नहीं दिख रहे। इंदौर से आठ बार सांसद रही पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ने बयान देकर दलबदल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अपने अंदाज में महाजन ने यह भी जता दिया कि वास्तव में जो भाजपा है उसमें ऐसा नहीं होता।सुमित्रा महाजन ने पूरे घटनाक्रम पर चर्चा करते हुए यह भी जता दिया कि इस तरह के घटनाक्रम की जानकारी खुद वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं है। महाजन की बात से यह भी साफ हो गया कि या तो इंदौर में हुए घटनाक्रम की जानकारी संगठन को नहीं थी या फिर अचानक सब कुछ हुआ।
महाजन ने इस मामले पर चर्चा करते हुए कहा कि क्यों किया और क्या किया इसकी जानकारी तो नहीं है लेकिन कई भले-भले लोगों के मुझे फोन आ रहे हैं। वे बोल रहे हैं कि भाजपा की ये बात हमें पसंद नहीं आई। जो वास्तव में भाजपा है।
मुझे उन्हें समझाना पड़ रहा है। क्योंकि लोग बोल रहे हैं कि हम भाजपा को वोट नहीं देंगे। हम नोटा करेंगे। पूर्व सांसद के इस बयान से भाजपा की चुनावी रणनीति पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। दरअसल घटना के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया था कि भाजपा के वरिष्ठ नेता भी इंदौर में हुए घटनाक्रम से खुश नहीं है। उल्लेखनीय है कि पटवारी इस पूरे मामले पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पर आरोप लगा रहे हैं।
बैठकें जारी रहे, बूथ नहीं छोड़े कार्यकर्ता
इस बीच दलबदल के बाद भले ही भाजपा की जीत आसान मानी जा रही है लेकिन संगठन इसे लेकर गंभीर है। भाजपा की ओर से लोकसभा क्षेत्र में सभी पदाधिकारियों को चुनाव अभियान व प्रचार पूर्व की तरह जारी रखने का निर्देश दिया है।
सभी पदाधिकारियों को यह भी कह दिया गया है कि मंडल और बूथ स्तर पर पूर्वनियोजित कार्यक्रम के अनुसार कार्यकर्ताओं की बैठक होती रहे। सभी को बूथ के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाए। दरअसल संगठन सावधान है कि कहीं एक तरफा चुनाव मानकर कार्यकर्ता शिथिल न पड़ जाए। ऐसा हुआ तो असर चुनाव परिणामों पर नजर आ सकता है।
