स्वर्णागिरी पर्वत की महिमा व पौराणिक मान्यता एवं विशेषताएं

By Abhishek Raghuvanshi
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स्वर्णागिरी पर्वत की महिमा व पौराणिक मान्यता एवं विशेषताएं। यह है की यहां से भगवान श्री कृष्ण और सुदामा उज्जैन सांदीपनि आश्रम से गुरु माता के आदेश अनुसार लकड़िया लेने आए थे इसी पर्वत से लकड़ियां चुनकर मौलियां बनाई थी जो आज नारायणा धाम में सजीव विद्यमान है।मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के चरण पड़ने के कारण यह पर्वत स्वर्ण (सोने) का हो गया इसी कारण इसे स्वर्णगिरी कहते हैं। आज भी यह मान्यता है कि यह पर्वत वर्ष में एक बार कुछ पल के लिए रात्रि में स्वर्ण का हो जाता है। यहां श्री कृष्ण के चरणों से बह रही गंगा (जल) की धारा जो ग्रीष्मकाल,अल्पवृष्टि, अनावृष्टि के कालखंड में भी निरंतर प्रवाहित रहती हैं।इस पर्वत में कई पत्थर ऐसे हैं जिन्हें बजाने पर उनमें से मंदिर के घंटे जैसी ध्वनि (आवाज) आती है। इस मंदिर के सम्मुख भगवान शिव और माता पार्वती के दो अलग-अलग मंदिर है मान्यता है कि यहां पर विवाह की कामना से, संतान प्राप्ति की कामना से या अन्य कोई मनोकामना से शिव मंदिर से शक्ति मंदिर तक जो धागा बांधते हैं उनकी मनोकामना शीघ्र पूर्ण होती है। पूर्णतया प्राकृतिक छटाओं, पाषाणों, वृक्षों – लताओं से औत-प्रौत देवस्थान होने के कारण यहां अद्भूत आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है। भगवान श्री कृष्ण के साथ इनके नितिवान, सदाचारी, निस्वार्थ भाव से इनकी भक्ति करने वाले इनके परम मित्र सुदामा जी की चरण धूली भी इस पर्वत में व्याप्त है।इस कारण गोवर्धन गिरिराज पर्वत के समान ही इस पर्वत की परिक्रमा का भी बड़ा महत्व है।

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