बहती ‘गंगा’ में हाथ धोने की जल्दी

By Abhishek Raghuvanshi
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कहावतें समय के साथ अपना रूप बदल लेती हैं। बहती गंगा में हाथ कौन नहीं धोना चाहता। वैसे अब न गंगा नदी उतनी स्वच्छ है और न हाथ धोने वालों की मंशा। हिट एंड रन के मामले में सजा के नए प्रविधानों को लेकर सोमवार को ड्राइवरों की हड़ताल हुई। पहले ही दिन अभूतपूर्व अफरातफरी मच गई। सब्जियों के दाम दोगुने हो गए। पेट्रोल पंपों की लाइनों का दृश्य भी अभूतपूर्व था। जाहिर है यह चिंता उस दिन या अगले की नहीं बल्कि परसों और उसके बाद की थी। समाज में घटते धैर्य की यह एक बानगीभर है। इसके पीछे इंटरनेट मीडिया और कथित स्वार्थी तत्व होते हैं। उसी दिन आई सब्जी या पहले से रखे फलों के बढ़े दाम तो यही कहते हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है कि इनके बिना कुछ खास बिगड़ जाता इसलिए नए जमाने में बहती गंगा में हाथ धोने वालों से बचना व तार्किक होना बहुत ज्यादा जरूरी है।

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