‘एक दिन नाना जी देशमुख मेरी दुकान पर आए और बोले, ‘प्रेस आकर हिसाब-किताब तो देख लो।’
उन दिनों राष्ट्रधर्म का प्रकाशन सदर बाजार से होता था। दुकान बंद करके एक रात मैं प्रेस गया। वहां देखा कि हॉल में दोनों ओर तार लगाकर कपड़े के परदों से केबिन बना दिए गए हैं। अंदर एक मेज और बरामदे में एक तख्त।
गर्मियों के दिन थे।
रात में काम खत्म हुआ तो दीनदयाल जी ने मुझे दरी, चादर और तकिया दे दिया। मुझे उन लोगों से पूछने का भी ध्यान नहीं रहा और तख्त पर सो गया। प्रात: काल नींद खुली तो वहां के दृश्य देख अचंभित रह गया। आंखों में आंसू भी आ गए।
दृश्य यह था कि मेरे ही बराबर नीचे जमीन पर दीनदयाल जी और अटल जी चटाई पर सो रहे थे। तकिया के स्थान पर दोनों लोगों ने अपने सिर के नीचे एक-एक ईंट लगा रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठा और दोनों लोगों को जगाया। फिर कहा, ‘आप लोगों ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया। ऊपर सोइए।’
पं. दीनदयाल उपाध्याय बोले, ‘आदत न खराब करिये।’
अटल जी ने हंसते हुए कहा, ‘जमीन छोड़ दी तो पैर कहां ठहरेंगे।’
शत-शत नमन ऐसी महान पुण्यात्मा
