सीरियाई मिलिट्री एकेडमी पर ड्रोन अटैक, 100 की मौत:240 से ज्यादा लोग घायल, ग्रेजुएशन सेरेमनी के दौरान बमबारी हुई

By Abhishek Raghuvanshi
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इस घटना में सीरिया के रक्षा मंत्री अली महमूद अब्बास बाल-बाल बचे। हमले से कुछ मिनट पहले ही वो कार्यक्रम से निकले थे।

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक एक चश्मदीद ने कहा- दौरान एकेडमी में ग्रेजुएशन सेरेमनी चल रही थी। लोग ग्राउंड में चले गए थे और तभी वहां पर धमाका हुआ। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो बम कहां से आया, बस चारों ओर लाशें ही दिखाई दे रही थीं।

हादसे से जुड़ी 2 तस्वीरें…

हमले से पहले बच्चे मिलिट्री एकेडमी में ग्रेजुएशन सेरेमनी में शामिल हुए।
हमले के बाद घायल लोगों की वहां मौजूद सेना के जवानों ने मदद की।

रक्षा मंत्री अली महमूद अब्बास बाल-बाल बचे
सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमन राइट्स (SOHR) ने कहा कि इस घटना में सीरिया के रक्षा मंत्री अली महमूद अब्बास बाल-बाल बचे। हमले से कुछ मिनट पहले ही वो कार्यक्रम से निकले थे। उनके जाते ही हथियारबंद ड्रोन ने वहां बमबारी और गोलाबारी शुरू हो गई।

अभी किसी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली
सीरिया की सेना ने हमले के लिए विरोधियों को जिम्मेदार ठहराया है, जिन्हें इंटरनेशनल सपोर्ट मिला हुआ है। हालांकि इस हमले की अब तक किसी संगठन ने जिम्मेदारी नहीं ली है। युद्ध से जूझ रहे सीरिया में इसे बड़े ड्रोन हमले के तौर पर देखा जा रहा है। इसे सीरियाई सैन्य ठिकानों पर अब तक का सबसे बड़ा खूनी हमला माना जा रहा है।

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वहीं, सीरिया सरकार ने इस हमले की पूरी ताकत से जवाब देने की कसम खाई है। सीरियाई सरकारी फोर्सेस ने दिन भर विपक्ष के कब्जे वाले इदलिब इलाके पर बमबारी की।

घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनका इलाज किया जा रहा है।

2011 से जारी है संघर्ष
सीरिया का संघर्ष 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के साथ शुरू हुआ, जो सिविल वॉर में बदल गया। वहां पर अब तक हजारों लोगों ने जान गंवाई है, जबकि लाखों लोगों को देश छोड़कर जाना पड़ा।

सीरिया में कैसे बने जंग के हालात?
2011 में जब अरब क्रांति की चिंगारी सीरिया तक पहुंची, तो वहां लोगों ने बशर-अल-असद की तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया।

अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन तब शुरू हुआ, जब सीरिया के डेरा इलाके में पुलिस ने कुछ स्कूल के बच्चों को हिरासत में ले लिया। उसकी वजह केवल यह थी कि उन बच्चों ने बशर-अल-असद के खिलाफ स्कूल की दीवार पर कुछ नारे लिख दिए थे।

काफी दिनों तक जब उन बच्चों को पुलिस ने नहीं छोड़ा तो हजारों की तादाद में लोग शांतिप्रिय प्रदर्शनों के लिए सड़कों पर उतर आए। ‘आर्मी और हम एक हैं’ के नारे लगा रहे लोगों पर सेना ने गोलियां चलाना शुरू कर दिया। शुरुआत में इस गोलीबारी में दो या तीन लोगों की मौत हुई थी, लेकिन उसके बाद लोगों में आक्रोश बढ़ना शुरू हो गया। वो लगातार प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरने लगे।अब बात केवल उन बच्चों की नहीं रही थी बल्कि लोगों के हकों और उनके अधिकारों पर आ गई थी।

धीरे-धीरे यह प्रदर्शन डेरा से दमास्कस, होम्स, हाना, लताकिया, बनियास, से होते हुए 2012 में अलेप्पो शहर तक पहुंच गया। जैसे-जैसे प्रदर्शन बढ़ता गया, वैसे-वैसे बशर-अल-असद के इशारों पर आर्मी की ज्यादतियां भी बढ़ने लगीं। अब आर्मी एक या दो लोगों को नहीं बल्कि हर प्रदर्शनकारी को निशाना बनाने लगी थी। आर्मी की ज्यादतियों से तंग आकर कुछ प्रदर्शनकारियों ने आर्मी को उसी की भाषा में जवाब देना शुरू कर दिया और हथियार उठा लिए।

जब लोकतंत्र के लिए सीरिया में हो रही लड़ाई की खबर बाहर देशों में पहुंची तो वहां रह रहे सीरियाई नागरिकों ने विद्रोह में हिस्सा लेने के लिए वापस सीरिया की तरफ कूच किया। हथियारों के जरिए विद्रोहियों को मदद पहुंचाना शुरू कर दिया। सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोही जल्द ही संगठित हो गए और फ्री सीरियन आर्मी के नाम से सरकार के खिलाफ लड़ने लगे।

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