- अफसरों को अवगत करवाया कि रीडर साहब पहली बार लापता नहीं हुए हैं। उनके कारण पूर्व में भी फटकार सुनी जा चुकी है।
पुलिस कमिश्नरेट में उस वक्त हड़कंप मच गया जब बड़े अफसर का रीडर बगैर बताए गायब हो गया। मुख्यालय के डीसीपी को वायरलेस सेट पर प्रसारण करवाना पड़ गया। आयुक्त मकरंद देऊस्कर उन दिनों छुट्टी पर थे और चार्ज अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (कानून) मनीष कपूरिया के पास था। इसी बीच सीआइडी डीजीपी जीपी सिंह ने पत्र लिखकर गंभीर अपराधों में लिप्त आदतन अपराधियों की जानकारी मांग ली। चारों डीसीपी ने अपने-अपने क्षेत्र से सूची भेज दी और रीडर लेकर गायब हो गया। विशेष पुलिस महानिदेशक को यह जानकारी हर हाल में 18 दिसंबर की सुबह 10 बजे पहुंचाना थी। रीडर से न फोन से संपर्क हुआ न कोई संदेश आया। जानकारी तो अफसरों ने जैसे-तैसे भेज दी लेकिन एक रिपोर्ट रीडर की भी बनाई। अफसरों को अवगत करवाया कि रीडर साहब पहली बार लापता नहीं हुए हैं। उनके कारण पूर्व में भी फटकार सुनी जा चुकी है।
डीसीपी की बैठक से होटल-पब संचालक परेशान
थर्टी फर्स्ट पर जश्न की तैयारी कर रहे होटल-पब संचालक जोन-2 के डीसीपी अभिषेक आनंद से मिलने के बाद परेशान हैं। सूटबूट में बैठक में शामिल हुए संचालक-मैनेजर यह सुनकर पसीना-पसीना हो गए कि उन्हें 11:30 बजे पार्टी बंद करनी पड़ेगी। आयोजक कुछ बोलते इसके पूर्व डीसीपी ने कहा कि 12:15 बजे पार्किंग भी खाली मिलना चाहिए। बैठक में तो सभी सहमत हो गए लेकिन बाहर निकलते ही इस बात पर बहस शुरू हो गई कि आयोजकों को क्या जबाव देंगे। विरोध की भनक लगते ही पुलिस ने खबर भिजवा दी कि होटल-रेस्त्रां में होने वाले आयोजन और आने वाले कलाकार की अनुमति लेनी होगी। अनुमति के लिए शर्तों का पालन करना होगा और विवादित कलाकार हुआ तो अनुमति निरस्त भी की जा सकती है। खैर, इस सख्ती से पार्टी के नाम पर होने वाले हुड़दंग पर नियंत्रण तो होगा।
छोटे साहब के कारण बिगड़ा ट्रैफिक का बाड़ा
ट्रैफिक बिगाड़ने वाले असल गुनहगार को अफसरों ने ढूंढ लिया है। छोटे साहब के नाम से फेमस अफसर के कारण अधीनस्थ अफसर यातायात में ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं। तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (ट्रैफिक) महेशचंद्र जैन के कार्यकाल में अफसर तालमेल से काम करते थे। इस बार यातायात पुलिस खेमों में बंट गई है। छोटे साहब का रिटायरमेंट नजदीक आ चुका है। लिहाजा मैदानी व्यवस्था से ज्यादा उनका फोकस लक्जरी बसों और बड़े वाहनों पर ज्यादा रहता है। वर्षों तक पदस्थ रहने के कारण ट्रैवल और ट्रांसपोर्ट संचालकों से भी लाइव कांटेक्ट है। खैर अफसर भी यह जान चुके हैं कि यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले जिम्मेदार ही गड़बड़ी कर रहे हैं।
एडीजी की आमद से परेशान आइजी-एडीजी
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (नारकोटिक्स) जयदीप प्रसाद को जैसे ही इंदौर संभाग प्रभारी नामांकित किया आइजी और एडीजी स्तर के अफसरों में खलबली मच गई। 1995 बैच के आइपीएस जयदीप प्रसाद इंदौर में एडिशनल एसपी रह चुके हैं। गृह विभाग ने कानून व्यवस्था एवं पुलिस कार्यों की समीक्षा के लिए 10 जिलों में एडीजी स्तर के अफसरों को नियुक्त किया है। जयदीप प्रसाद इंदौर की व्यवस्था देखेंगे। मोहन सरकार में पुलिस मुख्यालय और करीबी जिलों में बैठे आइजी नगरीय सीमा में पुलिस कमिश्नर बनने की संभावना तलाश रहे थे। कुछेक तो पूर्व में आइजी भी रह चुके हैं। कुछेक पदोन्नत होकर एडीजी बनने वाले हैं लेकिन प्रसाद के प्रभारी बनने पर उनके सामने पोस्टिंग की संभावना कम होने लगी है। प्रसाद की तेज तर्रार अफसरों में गिनती होती है। उनका लंबा वक्त केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर बीता है। इंदौर से वाकिफ भी रहे हैं। ऐसे में अगर फेरबदल होता है तो संभव है कि प्रसाद को आयुक्त के रूप में पदस्थ कर दें। उनका नाम आगे आते ही दौड़ में शामिल आइजी-एडीजी ने हाथ खींच लिए हैं।
