हाई कोर्ट ने खारीज की याचिका। उन्होंने मानवीय आधार पर सेवा में पुनः लिए जाने की गुहार लगाते हुए याचिका दायर की थी।
सूचना बगैर ट्रेनिंग बीच में छोड़कर जाने वाले को किसी तरह की राहत नहीं दी जा सकती। सीआरपीएफ के जवान से अतिरिक्त सतर्कता की अपेक्षा की जाती है लेकिन याचिकाकर्ता का कृत्य उसकी लापरवाही दर्शाता है। याचिकाकर्ता सेवा समाप्ति के 5 वर्ष बाद हाई कोर्ट पहुंचा है। ऐसे में उसे कोई राहत नहीं दी जा सकती। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने ट्रेनिंग बीच में छोड़कर जाने वाले छोटेलाल पैकरा की याचिका निरस्त कर दी। उन्होंने मानवीय आधार पर सेवा में पुनः लिए जाने की गुहार लगाते हुए याचिका दायर की थी।
छोटेलाल पैकरा का चयन 6 फरवरी 2017 को सीआरपीएफ में जवान के रुप में हुआ था। उसने 21 मार्च 2017 को ज्वाइन किया और नीमच में ट्रेनिंग भी शुरू कर दी। इस ट्रेनिंग को बीच से वह छोड़कर बगैर किसी सूचना के वह चला गया। 11 जुलाई 2017 को कमाडेंट सीआरपीएफ नीमच ने उसकी सेवा समाप्त कर दीं। इस आदेश को चुनौती देते हुए छोटेलाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसका कहना था कि सुकमा में 74वींबटालियन में पदस्थ उसका भाई बम ब्लास्ट में घायल हो गया था। वह उसी की देखभाल के लिए गया था।
छोटेलाल ने 11 जनवरी 2021 और 8 फरवरी 2021 को डीआइजी सीआरपीएफ को आवेदन देकर मानवीय आधार पर पुन: सेवा में पुनः लिए जाने की गुहार लगाई थी लेकिन डीआइजी ने इससे इंकार करते हुए आवेदन निरस्त कर दिया। हाई कोर्ट में केंद्र की ओर से बताया गया कि याचिकाकर्ता ने इस बात की कोई सूचना नहीं दी कि वह ट्रेनिंग बीच में छोड़कर क्यों गया। उसने हाई कोर्ट में याचिका सेवा समाप्ति के लगभग 5 वर्ष बाद दायर की है। कोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद याचिका निरस्त कर दी।
