मैं मम्मी और वेदा(छोटी बहन) के साथ पूजा करने गई थी। सब लोग कुआं(बावड़ी) पर चढ़ गए थे। अचानक स्लैब टूट गया और हम सब गिर गए। मैंने मम्मा का हाथ पकड़ा, लेकिन वह तो पानी में चली गई। एक अंकल का हाथ पकड़ कर मैं सीढ़ी के पास गई। वेदा भी मेरे पास में थी। मम्मा पानी में डूब रही थी। उनके मुंह में पानी घुस रहा था। बुलबुले देख कर मैंने एक हाथ से पानी हटाया। मुंह के पास फूंक मारी और पानी रोकने की कोशिश की। कुएं में अंधेरा था। थोड़ी देर बाद मुझे कुछ नहीं दिखा।
बहुत देर बाद एक अंकल आए और मेरा हाथ पकड़ लिया।
यह कहना है छह वर्षीय एलिना खुबचंदानी का जो तीन वर्षीय छोटी बहन वेदा और मां भूमिका के साथ बावड़ी में गिरी थी। वेदा और एलिना को सुरक्षित निकाल लिया लेकिन भूमिका डूबने से मर गई।
मेडिकल संचालक उमेश खानचंदानी की पत्नी भूमिका दोनों बेटी एलिना-वेदा और सास रेखा,देवरानी जीवन और भतीजे हितांश के साथ पूजा करने बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर(सर्वोदय-स्नेह-पटेलनगर) आई थी। करीब साढ़े 11 बजे हवन समाप्त हुआ था। राम नवमी के कारण मंदिर में भीड़ बढ़ चुकी थी।
भंडारा होने के कारण कालोनी और होस्टल की बच्चियां,महिलाएं ज्यादा तादाद में पहुंच गई। पूर्णाहुति के लिए भीड़ स्लेब पर चढ़ गई जहां हवन हो रहा था।
पुजारी लक्ष्मीनारायण शर्मा ने जैसे ही भगवान राम की आरती की थाली उठाई भरभरा कर स्लैब टूट गया। एलिना-वेदा सीढ़ी पकड़ कर खड़ी रही, लेकिन भूमिका की मौत हो गई। दोनों मासूम करीब दो घंटे तक सीढ़ी पकड़ कर खड़ी रही।
एलिना की बगल में ही भूमिका डूब रही थी। पानी घुसने के कारण भूमिका के मुंह से बुलबुले उठने लगे। एलिना ने पहले हाथ से पानी हटाया। मां की मौत से अनजान मासूम ने पानी में फूंक मारी ताकि मां के मुंह से पानी रोका जा सके। चोइथराम अस्पताल में भर्ती एलिना उस दृश्य को याद कर कांप जाती है।
झटके से अंधेरे में पहुंचे और पैरों के पास लाशें तैरने लगी
हवन तो समाप्त हो चुका था। पुजारी आरती करने वाला था। आरती की थाली को हाथ लगाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। अचानक भरभरा कर स्लैब टूटा और झटके के साथ अंधेरे में पहुंच गए। पानी गंदा और गहरा था। नीचे गिरे और झटके से उपर आए। जिसको तैरना आता था वह दीवार और सीढ़ियों तक पहुंच गया, लेकिन जो तैरना नहीं जानता था वो डूब गया। हमारे पैरों के पास लाशें तैर रही थी।चारों तरफ से चीत्कार सुनाई दे रही थी। कुछ देर बचने के लिए छटपटाहट हुई, लेकिन उसके बाद लोग डूबने लगे और रोने की आवाजें भी कम होती गई। बचाने वाले वक्त पर पहुंचते तो शायद सब बच सकते थे। मेरी मां पुष्पा,पत्नी वर्षा और बेटा तनिष्क भी भीड़ में बिछड़ गया।अंधेरा इतना था कि पास में कौन खड़ा है यह भी नजर नहीं आया।
(जैसा नवलखा निवासी रवि पाल ने बताया)
धड़ाम से गिरे और उछल कर ऊपर गए हम
हवन समाप्त करने के बाद मैं भगवान राम की आरती की तैयारी कर रहा था। 12 बजे के पहले आरती करना थी।महिलाएँ और बच्चे आरती में शामिल हुए थे। अचानक स्लैब टूट गया और धड़ाम से 45 फीट गहरी बावड़ी में जा गिरे। सभी झटके से पानी में गए और उछल कर ऊपर आए। मुझे तो तैरना आता था। मैं तैरते हुए सीढ़ियों तक आ गया। पानी बहुत गंदा था। महिलाओं को तैरना नहीं आया और वो डूब गई। स्लैब करीब 40 साल पहले लगाया था।सभी को पता भी था।
(जैसा पुजारी लक्ष्मीनारायण शर्मा ने बताया)
अंधेरे में दिखे तो नहीं, लेकिन एक दूसरे का हाथ पकड़ा
गिरते ही हाहाकार मच गया था। बच्चों और महिलाओं की रोने की आवाजें आ रही थी। तैरने वाले दीवार तक पहुंच गए। अंधेरे में किसी को दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन एक दूसरे के हाथ पकड़ रहे थे। दस-बारह लोग तो मेरे सामने ही लाश बन पानी में तैर रहे थे। लोगों ने उन्हें खींचने की कोशिश की, लेकिन उनमें जान ही नहीं थी। घंटे भर दहशत में रहे थे। तब बचने की उम्मीद ही खो दी थी।
(जैसा पटेलनगर निवासी लकड़ी कारोबारी भावेश पटेल ने बताया)
हवन में बैठे हुए थे। हवन कुंड बावड़ी के उपर बनाया गया था। लोग भजन गा रहे थे। पहले तो भीड़ कम थी, लेकिन आरती के वक्त लोग उमड़ पड़े। स्लैब टूटते ही सब बावड़ी में डूब गए। मुझे तो तैरना भी नहीं आता था, लेकिन भगवान ने चमत्कार किया और मैं सीढ़ियों के पास पहुंच गया। करीब एक घंटे सीढ़ी का कोना पकड़ कर खड़ा रहा।
(जैसा व्यवसायी महेश कौशल ने बताया)
बावड़ी से निकलते ही हनुमान चालीसा पढ़ी
बीके सिंधी कालोनी निवासी लक्ष्मण दलवानी भी बावड़ी में गिरे थे। उन्हें करीब दो घंटे बाद निकाला गया।आक्सीजन की कमी होने से उनकी तबीयत खराब हो गई थी। निगमकर्मी उन्हें निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। प्रारंभिक उपचार के बाद उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया। दलवानी काफी घबरा गए हैं।अस्पताल में भी वह हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। महापौर पुष्यमित्र भार्गव और एमआइसी सदस्य बबलू शर्मा हाल जानने पहुंचे तो आंख भर आई।
पुलिसवालों की डोर पकड़ कर खड़ा रहा
मैं काफी देर तक पानी में हाथ पैर चला कर बचने की कोशिश करता रहा। चारों तरफ से बचाओ-बचाओ की आवाजें आ रही थी। थोड़ी देर बाद पुलिस ने रस्सी डाल दी। मैं रस्सी पकड़ कर दो घंटे तक एक जगह पर खड़ा रहा, लेकिन महिलाओं और बच्चों की लाशें मुझे दिख रही थी।
(जैसा कुमार सेठी ने बताया)
