माफिया पर अफसरों का यू-टर्न घटनाक्रम में विशेष रुचि लेने वाले अफसरों ने दूसरे दिन यह कहकर चुप्पी साध ली कि मामला जमानती धाराओं का है।

By Abhishek Raghuvanshi
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शराब माफिया रिंकू भाटिया पर प्रकरण दर्ज कर अफसरों ने मुसीबत मोल ले ली। बढ़-चढ़कर घटना बताने वाले अफसरों ने दूसरे दिन यू-टर्न ले लिया। भाटिया के कर्मचारी वीरेंद्र व अर्जुन के बयानों पर साजिश का आरोपित बनाया। जोन-4 के डीसीपी आरके सिंह ने दावा किया कि हमला गुरुसिंघ सभा चुनाव में दबाव बनाने के लिए हुआ। शराब तस्करी, अपहरण, प्राणघातक हमला जैसे गंभीर मामलों में लिप्त भाटिया की तलाश है। घटनाक्रम में विशेष रुचि लेने वाले अफसरों ने दूसरे दिन यह कहकर चुप्पी साध ली कि मामला जमानती धाराओं का है। राष्ट्रीय सचिव मंजीत सिंह सिरसा के साथ घूम रहे भाटिया की तलाश में छापा मारने का दावा भी झूठा निकला। असल विवाद गुरुसिंघ सभा के चुनाव हैं, जिनमें दूसरा धड़ा मोनू भाटिया का है। पुलिस को वाहवाही की बयानबाजी भारी पड़ गई।
तबादला सूची में गड़बड़ी कर बैठे साहब
आचार संहिता के ऐन पहले जारी तबादला सूची में साहब गड़बड़ कर गए। 175 पुलिसकर्मियों की सूची जैसे ही थानों पर पहुंची, हड़कंप मच गया। कुछ नाम ऐसे थे, जो निलंबित और गंभीर प्रकरणों में फंसे हुए थे। आनन-फानन डीसीपी को बुलाकर छुट्टी के दिन निकाल करवाना पड़ा। पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर इधर-उधर करने में रुचि नहीं लेते हैं। सूची डीसीपी (मुख्यालय) जगदीश डाबर व एसीपी मनीष कपूरिया द्वारा बनाई गई थी। इसमें लाइन से निलंबित एसआइ को थाने भेजा तो अफसर चौंक गए। आदेश हाथ से निकलने के कारण सुधार की गुंजाइश भी नहीं रही। अत: साहब ने 2 अक्टूबर को डीसीपी कार्यालय से बहाली के आदेश जारी करवाए।
आयोग पहुंचा पीएचक्यू का परवाना
पुलिस मुख्यालय से जारी परवाना एसपी, डीआइजी और आइजी के लिए मुसीबत बन सकता है। कार्मिक कार्यालय से जारी परवाना चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। वरिष्ठ कार्यालय मुख्यालय के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। अगस्त माह में जारी परवाना (पुमु 03/कार्मिक/ 1/155/2563) में स्पष्ट लिखा है कि भ्रष्टाचार, नैतिक अद्योपतन, शारीरिक हिंसा एवं अवैध निरोध संबंधी प्रकरणों में फंसे पुलिस अधिकारियों की थानों, क्राइम ब्रांच या अफसरों के कार्यालयों में भी तैनाती नहीं हो सकती। इसके बाद भी एसपी, डीआइजी और आइजी ने कई पोस्टिंग कर दी हैं। शिकायत में लोकायुक्त प्रकरणों के साथ-साथ हिरासत में मौत के मामलों का जिक्र भी किया गया है। यह भी कहा है कि ऐसे अफसरों की पोस्टिंग कर दी गई, जिनके विरुद्ध न्यायिक जांच बैठी हुई है। कुछ अफसरों पर गंभीर धाराओं में आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हैं।
एसीपी का इस्तीफा और महकमे में सुगबुगाहट
एसीपी (हीरानगर) धैर्यशील येवले के इस्तीफे से महकमे में सुगबुगाहट है। मल्हारगंज, संयोगितागंज व पलासिया थाना में टीआइ रह चुके येवले दबाव में थे। पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर फरार आरोपितों की गिरफ्तारी न करने पर नाराज थे। येवले तनाव न सह सके और स्वैच्छिक सेवानिवृति मांग ली। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई कि जोड़-तोड़ कर नगरीय सीमा में आए टीआइ, एसीपी, एडीसीपी के लिए आयुक्त को चला देना आसान नहीं है। कागज चलाने में माहिर आयुक्त थानों व दफ्तरों पर भी पैनी नजर रखते हैं। कानून व्यवस्था का बहाना बनाने वाले थाना प्रभारी और एसीपी को प्रतिदिन कार्रवाई का हिसाब देना पड़ता है। गड़बड़ी करने वाले कमिश्नर कार्यालय तलब कर लिए जाते हैं व डीसीपी से उनकी जांच भी करवा ली जाती है।

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