भूपेंद्र भिया ही हमारी नैया पार करवा सकते हैं

By Abhishek Raghuvanshi
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भूपेंद्र यादव ने इससे पहले भले ही मप्र में कभी काम नहीं किया, लेकिन यहां के नेताओं से लगातार संपर्क में रहते थे।
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अभी रणनीतिक बिसात बिछाते हुए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को प्रभारी नियुक्त किया है। प्रभारी नियुक्त होने के बाद से वे दो बार इंदौर भी आ चुके हैं। फिलहाल भी वे इंदौर में ही है। अपनी इन दोनों यात्राओं में वे केंद्रीय मंत्री के नाते ही इंदौर आए थे। इस दौरान भले ही वे किसी भी राजनीतिक चर्चा से बचते नजर आए, पर इंदौर के नेता उनके इर्द-गिर्द रहकर अपनी गोटियां फिट करने में लगे रहे। अपनी दोनों यात्राओं में यादव जहां भी गए, स्थानीय नेता उन्हें पूरे समय घेरे नजर आए। इंदौरी नेताओं को लग रहा है कि अब भूपेंद्र भिया ही हमारी नैया पार करवा सकते हैं। भूपेंद्र यादव ने इससे पहले भले ही मप्र में कभी काम नहीं किया, लेकिन यहां के नेताओं से लगातार संपर्क में रहते थे। इससे उन्हें इंदौर की राजनीति और यहां के नेताओं की अच्छी समझ है।
बत्ती गुल से जनप्रतिनिधि भी परेशान
बत्ती गुल और बिजली कटौती का नाम आते ही लोगों को कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार का दौर याद आने लगता है। बिजली कटौती की समस्या के कारण ही 2003 में दिग्विजय सिंह को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। ऐसे में जरा सी बिजली कटौती और बत्ती गुल की समस्या से आम उपभोक्ता से ज्यादा नेता और जनप्रतिनिधि परेशान होने लगते हैं। इन दिनों शहर से लेकर गांवों तक में लगातार बिजली गुल हो रही है। अब जनप्रतिनिधि भी इस कटौती को लेकर अधिकारियों से मंत्री तक को फोन लगा रहे हैं। मध्य प्रदेश में 4 महीने बाद विधानसभा चुनाव होना है। ऐसे में जनप्रतिनिधि इस बात को लेकर चिंतित है कि बार-बार की बत्ती गुल से कहीं उनकी सत्ता की बिजली गुल न हो जाए। नेताओं के बढ़ते दबाव और फोनों से भोपाल में बैठे आला अधिकारी भी परेशान हो गए है, वे भी नहीं समझ पा रहे हैं कि बत्ती गुल होने का कारण क्या है।
जिन्हें करीब लाने की गई ताजपोशी, वे ही नजर आए दूर
1984 में भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। इन दंगों से कई लोग प्रभावित हुए थे। सिख समाज इन दंगों के लिए कांग्रेस के कुछ नेताओं को दोषी मानता है। इन दंगों के बाद से ही कांग्रेस नेता सिखों को अपने साथ लाने के लिए तरह-तरह के जतन करते रहते हैं। इसी कड़ी में इंदौर कांग्रेस की कमान भी सिख नेता सुरजीत सिंह चड्ढा को सौंपी गई। पिछले दिनों उन्होंने पदभार भी ग्रहण कर लिया। उनके स्वागत के लिए भारी भीड़ तो उमड़ी थी, पर जिन सिखों को करीब लाने के उद्देश्य से सुरजीत को कमान सौंपी गई थी, वे ही पूरे आयोजन से दूर नजर आए। इस नियुक्ति से उम्मीद जताई जा रही थी कि सिख बिरादरी के लोग कांग्रेस के करीब आएंगे, पर ऐसा होता कम ही नजर नहीं आ रहा है।
सर्वे करने वाली कंपनी की तलाश कर रहे हैं दावेदार
इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने दलों ने तय किया है कि सर्वे में जिसकी रिपोर्ट अच्छी होगी, उसे ही टिकट दिया जाएगा। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा कोई भी नेता विधानसभा की टिकट मांगने आता है तो उससे स्पष्ट कह दिया जाता है कि यदि आपकी रिपोर्ट में अच्छी होगी, तो आपको टिकट मिल जाएगा। दावेदारों को साफ तौर पर कह दिया गया है कि बार-बार दिल्ली या भोपाल के चक्कर लगाकर वरिष्ठ नेताओं का समय खराब करने की जरूरत नहीं है। टिकट के दावेदार भी अब नेताओं के चक्कर लगाने के बजाय सर्वे करने वाली एजेंसी का पता लगाने में जुट गए है। दावेदारों को लग रहा है कि सर्वे में अपना नाम आ गया तो टिकट पक्का हो जाएगा। खैर टिकट किसे मिलेगा यह तो वक्त ही बताएगा, पर टिकट के लिए रस्साकशी अभी से शुरू हो गई है।


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