राहुल गांधी की सदस्यता को निरस्त करने के विरोध में सड़क पर उतरी कांग्रेस।

By Abhishek Raghuvanshi
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  • कांग्रेसियों द्धारा केंद्र सरकार का पुतला दहन करना चुनावी हथकंडे के आलावा कुछ नही
  • क्या कांग्रेसी नेताओ के साथ कांग्रेस सरकार का दामन साफ रहा है ?

चुनावी आमसभा में राहुल गांधी ने अपने भाषण के बूते मतदताओ को अपना झुझारूपन दिखाने के मकसद से जो भाषण दिया था उसका मूल स्वरूप भाषण में लगाए आरोप न उस वक्त, उस परिस्थिति में ठीक थे न बाद में मामला न्यायालीन रहा लंबी प्रकिया चलने के बाद निर्णय के पूर्व पक्ष रखने का मौका भी राहुल गांधी को मिला होंगा। क्या शब्दों की महत्ता और लगाए आरोप की गंभीरता को राहुल और राहुल की पार्टी के अव्वल दर्जे के वकील भांप नही सके थे? या भांपकर भी नाखून कटवाकर शहीद की श्रेणी में खड़ा कर वीर सावरकर जी के समकक्ष या उनसे बड़ा साबित करने में लगे थे!
मामला न्यायालीन था, निर्णय जज ने दिया विरोध भारतीय जनता पार्टी के साथ मोदी का! आखिर क्यो?

देश भर में मोदी का विरोध, दोयम दर्जे की भाषा का उपयोग और पुतला दहन कितना सही कितना गलत इसका निर्णय 2024 के मतदाताओं के दिमागी सुचना पटल पर अंकित हो चुका है। कांग्रेसियों के विरोध, रेल रोको, पुतला जलाओ सही या गलत का निर्णय मतदाता देंगे इसके लिए 2024 के चुनावी परीणाम तक इंतजार करना होंगा।

अब मूल प्रश्न यह है सत्ता के समीप रहने वाली कांग्रेस मोदी युग के पदार्पण के बाद से ही घबराहट में क्यो दिखाईं देने लगीं है?
क्या मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से डरी, सहमी है या सत्ता के नशे में जो भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे उससे बाहर कैसे निकला जाए मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का अनर्गल आरोप लगाकर मोदी सरकार को कांग्रेस के समांतर खड़ा कर वेतरणी पार करना चाहती है इसका लाभ कितना मिलेगा अभी गर्त में ही है।

क्या कांग्रेस का दामन साफ था
महंगाई का विरोध, देश में बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ़ सदन में जो लड़ाई लड़ना चाहिए उस लड़ाई को सड़क पर लड़ने वाली कांग्रेस केन्द्र सरकार की कड़ी आलोचना करती रही है, इस पार्टी के नेताओ का हमेशा आरोप रहा है लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा लोकतंत्र की हत्या कर रही है मोदी सरकार! आरोप के बूते कांग्रेसी नेता भाजपा और जय भाजपा विजय भाजपा के लक्ष्य को साधने वाले नरेंद्र मोदी को कितना कटघरे में खड़ कर सकी! या कटघरे में खड़ा करने की हिम्मत ही जुटा सकी है ! क्या यह सच नहीं सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली जैसी कहावत को चरितार्थ नही कर रही है कांग्रेस?

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अतीत में किए बहुत सारे मामले को उधेड़े तो इस पार्टी की छबि भी दागदार ही रही है! क्या पार्टी के जवाबदारो का अतीत केन्द्र में रहते निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त करने जैसे कारनामें करने का रहा नही है?

हम अतीत को थोड़ा आगे जाकर कुरेदे तो याद आता है 1959 का वह साल जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बिटिया इंदिरा गांधी को एक साल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष की बागडोर थमा दी थीं! और तब केरल में ई. एस. एम. नंबुदीरीपाद की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को राज्यपाल

बुरगुला रामाकृष्णा की अनुशंसा पर बर्खास्त कर दिया गया था। क्या संविधान की धारा 356 के उल्ट निर्णय नही था यह ?और इस निर्णय के पीछे उस एक साल के लिए बनी अध्यक्ष की भुमिका नही थी ?

हम थोड़ा और पीछे चले इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री के तौर पर दो कार्यकाल 1966-1977 और 1980 – 1984 क्या गैर कांग्रेसी सरकारों को हटाया नही गया है ? केंद्र में इंदिरा गांधी, पश्चिम बंगाल में धर्मवीरा राज्यपाल, 31जनवरी 1976 तमिलनाडु,1980 हरियाणा में भजनलाल ने अपनी चुनी हुई सरकार का कांग्रेस में विलय किसी दबाव में ही किया था ! अथवा उनकी अपनी मर्जी से क्या यह सच नहीं भजनलाल को सरकार भंग होने का खतरा मंडराता दिख रहा था! कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू के बाद, इंदिरा और बाद में संजय गांधी के बाद राजीव गांधी का उदय 1983 कांग्रेस महासचिव पद से हुआ था। तब आंध्र प्रदेश में राज्यपाल रामलाल थे वर्ष 1984 एन.टी.रामाराव की बहुमत के साथ चुनी सरकार को बर्खास्त करा गया था। राजीव गांधी और बूटा सिंह की जुगलबंदी या आपसी वफादारी 1985 से लेकर 1989 के बिच राज्यो में कितनी सरकारें बर्खास्त हुई उसका आकलन और लोकतंत्र की हत्या के आरोप का अनुमान कांग्रेस खुद लगा ले कब से और कैसे शुरू हुआ । 1991 एम. करुणानिधि तमिलनाडु, 2005 बिहार ये अलग बात है तब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल फैसले को पलट दिया था। क्या यह सच नहीं कांग्रेस देश की सत्ता में किसी और को पदस्थ रहते देखने की हिम्मत कर पाती न बर्दास्त करने की क्षमता रख पाती थीं ? ऐसे में नरेंद्र मोदी के 2014 के पांच साल के कार्यकाल बाद 2019 की दूसरी पारी के साल और किसी भी प्रकार के आरोप शून्य को कैसे सहन कर सकते है।ऐसे में समूची पार्टी के पास अडानी, अंबानी, माल्या, चौकसी, जैसे कुछ नामो पर आरोप और आरोपों के मूल में मोदी को रखकर अमर्यादित भाषाओं का चलन चलाकर अपनी खोई हुई पहचान को पाने की चाहत रखने वाले नेता, देश के माने वकील 2023 में भी आपने उप नयनों से 2024 को देख रहे है !

खेर कांग्रेस का अतीत और इनका दामन कितना साफ है से बाहर निकलकर हम राहुल गांधी पर आए फैसले पर आते है। एक अर्से से राहुल को कमजोर नेतृत्व क्षमता वाला नेता बताया जा रहा है। उनके अधिकांश भाषणो को मिमिक्री के रूप में परोसे जाता है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्सएप पर राहुल के भाषणों को टाईम पास का रूपांतरण दे सेंड किया जानें लगा है। राहुल के भाषणों में गंभीरता का हास्य हो रहा महिलाओ, युवाओं और सोशल मीडिया से जुड़ा वह वर्ग जो या तो स्कूल गया ही नही या पांचवी, सातवी तक पढ़ाई कर स्कूल से दूरी बनाने वाला बड़ा वर्ग एयनरोइड मोबाईल चलाने लगा है। उसे नही मालूम भारत की राजनीति किस करवट बैठ रही है उसे राहुल के भाषण में मिमिक्री, और हास्य दिखाईं दे रहा है ये मिमिक्री सही है या उसे जानबूझकर परोसी जा रही उससे वह अनजान है। कांग्रेसियों की झूट को बेनकाब नही करने की आदत से राहुल को युवा, बच्चे, महिलाए कॉमेडियन के रूप में लेने लगीं है। जो 2024के लिहाज से ठीक नही है। इस गंभीरता को समझने और निर्णय लेंने के बजाए राहुल के नाखून कटवाकर शहीद करने का सपना देखने में लगे नेताओ और वरिष्ठ वकीलों को समझना होंगा, विपक्ष के शाब्दिक मायाजाल में जन मानस उलझ गया है। इस मायाजाल से कैसे निकला जाए इस विषय पर कोई ठोस निर्णय ले। राहुल के भाषणों और शब्दों में कितनी सत्यता रहती है अथवा है उसे आपको भापना और समझना है । शब्दों की गंभीरता को समझने में चूक का परीणाम है दो साल की सजा ! और सांसद भवन से बिदाई! अब भी समय है, संसद और सासंद की गरीमा का पालन कर हल का रास्ता खोंजे विकल्प को तलाशे, रेल रोकने, पुतला जलाने, मोदी को गाली बकने से सत्ता वापस नही आयेगी न सासंद की सदस्यता बरकरार रह सकती है।

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