दिल्ली अध्यादेश बिल में कर दिया खेल, सीमित हो सकते हैं केजरीवाल सरकार के अधिकार

By Abhishek Raghuvanshi
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नई दिल्ली: दिल्ली में अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग और सर्विसेज पर नियंत्रण से जुड़ा जो विधेयक मंगलवार को संसद में पेश किया गया है, उसमें कुछ बदलाव भी किए गए हैं। इस बिल में कुछ नए प्रावधान भी किए गए हैं, जो पहले केंद्र सरकार द्वारा जारी अध्यादेश में शामिल नहीं थे। दूसरी तरफ अध्यादेश में किए गए कुछ प्रावधानों को बिल में हटाया भी गया है। इन बदलावों से सर्विसेज के मामले में दिल्ली सरकार के अधिकार और ज्यादा सीमित होने की आशंका जताई जा रही है।

दिल्ली विधानसभा के कानून बनाने के अधिकार सीमित
वैसे तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक में अध्यादेश के लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रावधानों को शामिल किया गया है, लेकिन अब इसमें से अध्यादेश की धारा-3ए को हटा दिया है, जिसके तहत कुछ अतिरिक्त प्रावधान करके दिल्ली विधानसभा की कानून पास करने की शक्तियों को सीमित किया गया था। मगर अब इस सेक्शन के हटाए जाने के बाद दिल्ली विधानसभा पहले की तरह ही संविधान के प्रावधानों के मुताबिक दिल्ली सरकार से जुड़े विषयों के संबंध में कानून पास कर सकेगी। हालांकि, ‘सर्विसेज’ के मामले में विधानसभा का दखल बेहद सीमित ही रहेगा।

इन प्रावधानों को किया शामिल
इसके अलावा नैशनल कैपिटल सिविल सर्विसेज अथॉरिटी की एनुअल रिपोर्ट को संसद और दिल्ली विधानसभा में पेश करने की अनिवार्यता के प्रावधान को भी खत्म कर दिया गया है, ताकि गोपनीयता बनी रहे। केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्तावों या मामलों से संबंधित मंत्रियों के आदेशों को एलजी और मुख्यमंत्री के समक्ष रखने की अनिवार्यता के प्रावधान को भी हटाया गया है

सेक्शन 45-डी सबसे अहम
बिल में किए गए नए प्रावधानों में सेक्शन 45-डी सबसे अहम है। इसमें कहा गया है कि संसद में पास किए गए कानून के आधार पर या उसके अनुपालन में दिल्ली में गठित किए गए किसी भी बोर्ड, अथॉरिटी, कमीशन या अन्य वैधानिक निकायों के अध्यक्ष, चेयरमैन या सदस्य की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाएगी। वहीं दिल्ली विधानसभा में पास किए गए कानून के आधार पर गठित किए गए किसी आयोग, बोर्ड या प्राधिकरण में नियुक्ति के लिए नैशनल कैपिटल सिविल सर्विसेज अथॉरिटी की तरफ से सेक्शन 45-एच के प्रावधानों के तहत उपयुक्त लोगों के नामों का पैनल बनाकर एलजी को सिफारिश भेजी जाएगी

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तो शक्तियों में हो जाएगी और कटौती
संसद में पेश विधेयक में किए गए बदलावों के बाद प्रशासन में उच्चस्तर पर दिल्ली सरकार का हस्तक्षेप बहुत कम रह जाएगा। यहां तक कि मंत्री द्वारा जारी कोई स्टैंडिंग ऑर्डर कानूनी प्रावधानों के विरुद्ध लगता है, तो संबंधित विभाग के सचिव या अन्य उच्च अधिकारी उसे लागू करने या मानने से इनकार कर सकता है, क्योंकि सारे वैधानिक या वित्तीय अधिकार उन्हीं के पास रहेंगे। सेक्शन 45-डी के शामिल होने से सभी प्रमुख बोर्ड, आयोग, प्राधिकरणों में नियुक्ति का अधिकार भी सीधे तौर पर एलजी के माध्यम से केंद्र सरकार के हाथ में आ जाएगा, क्योंकि इनमें नियुक्तियां राष्ट्रपति के माध्यम से की जाएंगी। वहीं, दिल्ली विधानसभा में पास कानूनों के आधार पर बनाए गए बोर्ड या आयोग में भी नियुक्तियां राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण की तरफ से एलजी को भेजी जाने वाली नामों की सिफारिश के आधार पर की जाएगी। ऐसे में यहां भी दिल्ली सरकार के अधिकार कम हो जाएंगे, क्योंकि प्राधिकरण की अध्यक्षता भले ही सीएम कर रहे हों, लेकिन बाकी के दो मेंबर केंद्र सरकार के नुमाइंदे ही होंगे और किसी भी मामले में फैसला बहुमत के आधार पर होगा। ऐसे में सीएम की भूमिका सीमित रहेगी।

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